Jitiya Vrat 2025: तरोई के पत्तों के बिना क्यों अधूरी मानी जाती है जितिया पूजा? जानिए इसका महत्व

Published : Sep 13, 2025, 07:21 PM IST
Jitiya Vrat 2025

सार

Jitiya Vrat 2025: जितिया व्रत 2025, 14 सितंबर को मनाया जाएगा। इस व्रत में तरोई के पत्तों का विशेष महत्व है। इन पत्तों पर पूजा सामग्री और प्रसाद चढ़ाया जाता है। इन्हें पवित्रता, दैवीय ऊर्जा और सूर्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है। 

Jitiya Vrat 2025: जितिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है, 14 सितंबर रविवार 2025 को मनाया जाएगा। माताएं अपनी संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं। यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। इस कठिन व्रत में महिलाएं 24 घंटे से ज़्यादा समय तक निर्जला (बिना पानी के) व्रत रखती हैं। व्रत और पूजा के साथ-साथ इस व्रत की कुछ विशेष परंपराएं भी हैं, जिनमें तरोई के पत्तों का प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

जितिया व्रत में तरोई के पत्तों का प्रयोग कई कारणों से खास होता है। सबसे पहले, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन पत्तों को बहुत पवित्र और शुद्ध माना जाता है। पूजा के दौरान, इन पत्तों पर देवताओं को प्रसाद और भोग रखकर अर्पित किया जाता है। इसके अलावा, व्रत से जुड़ी अन्य सामग्री भी इन पत्तों पर सजाई जाती है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और व्रत के नियमों का एक अनिवार्य हिस्सा मानी जाती है।

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पवित्रता और दैवीय ऊर्जा का प्रतीक

आस्था से जुड़े लोगों का मानना ​​है कि तरोई के पत्तों पर रखी गई कोई भी सामग्री न केवल शुद्ध रहती है, बल्कि दैवीय ऊर्जा से भी लीन हो जाती है। ऐसा माना जाता है कि इन पत्तों में मौजूद प्राकृतिक गुण पूजा की पवित्रता को और बढ़ा देते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि तरोई के पत्ते भगवान सूर्य और मातृशक्ति को प्रिय हैं और इनका प्रयोग करने से पूजा और भी फलदायी हो जाती है। इसी कारण, तरोई के पत्तों के बिना जितिया व्रत की पूजा अधूरी मानी जाती है।

प्रकृति से जुड़ाव का संदेश

जितिया व्रत केवल धार्मिक आस्था का पर्व ही नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ाव का संदेश भी देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां यह व्रत विशेष रूप से प्रचलित है, तरोई के पत्तों का प्रयोग प्रकृति के संरक्षण और उसके उपहारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक प्रतीकात्मक तरीका है। यह परंपरा हमें अपनी पूजा और जीवन में प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान करना सिखाती है। इस प्रकार यह व्रत आस्था, परंपरा और पर्यावरण के बीच गहरा संबंध स्थापित करता है, जो इसे और भी खास बनाता है।

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Disclaimer: इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

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