
Akshaya Tritiya 2024 Puja Shubh Muhurat: हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया पर अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाता है। इसे अबूझ और स्वयंसिद्ध मुहूर्त भी कहते हैं। इस बार ये शुभ तिथि 10 मई, शुक्रवार को है। इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता ये भी है कि इसी तिथि पर कुबेरदेव ने देवी लक्ष्मी से धन की याचना की थी और देवी ने उन्हें धनाध्यक्ष बना दिया था। इसलिए ऐसा कहते हैं जो व्यक्ति इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करता है, उसे जीवन भर धन की कमी नहीं होती। आगे जानिए देवी लक्ष्मी की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र आदि खास बातें…
अक्षय तृतीया 2024 शुभ मुहूर्त (Akshaya Tritiya 2024 Shubh Muhurat)
अक्षय तृतीया पर देवी लक्ष्मी की पूजा के साथ-साथ सोना खरीदने की परंपरा भी है। आगे बताए गए शुभ मुहूर्त में आप ये दोनों काम कर सकते हैं…
- सुबह 05:33 से 10:37 तक
- दोपहर 12.18 से 01.59 तक
- शाम 05.21 से 07.02 तक
- रात 09.40 से 10.59 मिनिट तक
अक्षय तृतीया पूजा विधि (Akshaya Tritiya 2024 Puja Vidhi)
- अक्षय तृतीया पर 10 मई, शुक्रवार की सुबह जल्दी उठकर सबसे पहले स्नान आदि करें और इसके बाद हाथ में जल-चावल लेकर व्रत-पूजा का संकल्प लें।
- ऊपर बताए गए किसी भी शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र घर के एक साफ स्थान पर एक बाजोट के ऊपर स्थापित करें।
- गाय के दूध से विष्णु-लक्ष्मी प्रतिमा का अभिषेक करें। साथ ही ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मी नमः का जाप भी करें।
- इसके बाद शुद्ध जल से पुन: भगवान का अभिषेक करें। कुमकुम से तिलक लगाएं, फूलों की माला पहनाएं और शुद्ध घी का दीपक भी जलाएं।
- अबीर, गुलाल, चावल, फूल, पान, फल, वस्त्र, नारियल आदि चीजें एक-एक चढ़ाते रहें। खीर का भोग भी लगाएं। आरती करें और प्रसाद भक्तों में बांट दें।
- पूजा के बाद भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी से सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। संभव हो तो कुछ देर वहीं बैठकर ईश्वर का ध्यान भी करें।
- इस प्रकार अक्षय तृतीया पर जो देवी लक्ष्मी-भगवान विष्णु की पूजा करता है उसे कभी धन की कमी नहीं होती और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
देवी लक्ष्मी की आरती हिंदी में (Devi Lakshmi Aarti Lyrics in Hindi)
ऊं जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता।
तुमको निसिदिन सेवत हर विष्णु-धाता।। ऊं।।
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग माता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता।। ऊं...।।
दुर्गारूप निरंजनि, सुख-सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, रिद्धि-सिद्धि धन पाता।। ऊं...।।
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधिकी त्राता।। ऊं...।।
जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता।
सब संभव हो जाता, मन नहिं घबराता।। ऊं...।।
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता।
खान-पान का वैभव सब तुमसे आता।। ऊं...।।
शुभ-गुण-मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता।। ऊं...।।
महालक्ष्मी(जी) की आरती, जो कोई नर गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता।। ऊं...।।
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