
Akshaya Tritiya Katha: 30 अप्रैल, बुधवार को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाएगा। धर्म ग्रंथों में इस तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान विष्णु के तीन अवतार (परशुराम, हयग्रीव और नर-नारायण) इसी दिन प्रकट हुए थे। इसी दिन भगवान सूर्य ने द्रौपदी को अक्षय पात्र दिया था साथ ही देवी लक्ष्मी कुबेर को धनाध्यक्ष बनाया था। इस तिथि से जुड़े ऐसी अनेक मान्यता है जिसके चलते इसका विशेष महत्व है। अक्षय तृतीया से जुड़ी कथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताई थी। आगे आप भी जानें अक्षय तृतीया की कथा…
प्राचीन समय में महोदय नाम का एक वैश्य यानी बनिया रहता था। वह परोकारी और हमेशा सत्य बोलने वाला था। वह हमेशा देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा करता था। एक बार जब वह किसी काम से कहीं जा रहा था, तभी मार्ग में उसने कुछ ऋषियों को अक्षय तृतीया का महत्व बताते हुए सुना। वो ऋषि कह रहे थे ‘अक्षय तृतीया पर किये जाने वाले दान, हवन, पूजन आदि शुभ कामों का अक्षय यानी संपूर्ण फल प्राप्त होता है। इस दिन देवताओं एवं पितरों के निमित्त जो भी दान, हवन, तर्पण आदि किया जाता है, उस पुण्य भी कभी क्षय नहीं होता।’
ऋषियों के मुंह से ऐसी बात सुनकर महोदय के मन में विचार आया कि यह तो अति उत्तम व्रत है, इसलिए मुझे भी इसका लाभ लेना चाहिए। यह सोचते हुए महोदय ने गंगा तट पर जाकर अपने पितरों और देवताओं का तर्पण किया। इसके बाद घर आकर उसने ब्राह्मणों को अनाज, भोजन, कपड़े, दही, दूध जैसी अनेक चीजों का दान किया। ऐसा करने से उसे परम सुख का अनुभव हुआ। इस तरह दान-धर्म और भगवान का स्मरण करते हुए एक दिन महोदय की मृत्यु हो गई।
अगले जन्म में महोदय वैश्य ने कुशावतीपुरी स्थान पर क्षत्रिय के रूप में जन्म लिया। पिछले जन्म में किए गए दान-पुण्य के चलते इस जन्म में भी उसे धन-वैभव प्राप्त हुआ। इस जन्म में भी उसने अपनी संपत्ति का उपयोग दान, हवन, यज्ञ आदि में किया। यह महोदय द्वारा पूर्व जन्म में किए गए अक्षय तृतीया के व्रत का प्रभाव था। दोनों जन्मों में किए गए दान-पुण्य के फल से वह जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो गया और भगवान के धाम को चला गया।
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