
Raksha Bandhan Kyo Manate Hai: सावन मास की पूर्णिमा का महत्व अनेक धर्म ग्रंथों में बताया गया है। इस दिन रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है। इस बार रक्षाबंधन 9 अगस्त, शनिवार को है। रक्षाबंधन क्यों मनाते हैं और ये परंपरा कैसे शुरू हुई? इसके बारे में धर्म ग्रंथों में अनेक रोचक कथाएं बताई गई हैं। आगे जानिए रक्षाबंधन से जुड़ी कुछ ऐसी ही कथाएं और मान्यताएं…
रक्षा बंधन की सबसे प्रचलित कथा देवराज इंद्र से जुड़ी है। उसके अनुसार ‘एक बार देवता और दानवों में युद्ध शुरू हो गया। ये युद्ध लंबे समय तक चलता रहा। युद्ध में देवताओं की शक्ति कम होने लगी। तब देवराज इंद्र ने ये बात देवगुरु बृहस्पति को बताई। देवगुरु बृहस्पति ने कहा ‘युद्ध में विजय के लिए मैं एक विशेष रक्षा सूत्र तैयार करूंगा, जिसे तुम अपनी पत्नी शचि द्वारा कलाई पर बंधवा लेना। इससे देवताओं की विजय निश्चित होगी।’ देवराजा इंद्र ने ऐसा ही किया, जिससे देवता ये युद्ध जीत गए। श्रावण पूर्णिमा पर ही देवराजा इंद्र ने अपनी पत्नी शचि से ये रक्षा सूत्र बंधवाया था, तभी से रक्षाबंधन पर्व की परंपरा शुरू हुई। बाद में ये पर्व भाई-बहन के पवित्र प्रेम में बदल गया।
रक्षाबंधन से जुड़ी दूसरी कथा देवी लक्ष्मी और दैत्यों के राजा बलि से संबंधित है। उसके अनुसार ’भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर दैत्यराज बलि से उसका सबकुछ छिन लिया और उसे पाताल का राजा बना दिया। भगवान वामन ने बलि से वरदान मांगने को कहा। तब राजा बलि ने कहा ‘आप पाताल में मेरे द्वारपाल बनकर रहिए।’ वचनबद्ध होने के कारण भगवान उनके साथ पाताल चले गए। तब देवी लक्ष्मी भी पाताल पहुंच गई और रक्षा सूत्र बांधकर बलि को अपना भाई बना लिया। जब राजा बलि ने उपहार देने की बात कही तो देवी लक्ष्मी ने चतुराई से अपने पति यानी भगवान विष्णु को ही मांग लिया। इस तरह देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु को लेकर पुन: बैकुंठ लोक आ गईं। तभी ये रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा रहा है।
रक्षाबंधन से जुड़ी तीसरी कथा भी है, जो महाभारत में मिलती है। उसके अनुसार, ‘जब पांडव राजसूय यज्ञ कर रहे थे तो अग्र पूजा के लिए श्रीकृष्ण को चुना गया। उसी समय शिशुपाल भी वहां आ गया और श्रीकृष्ण को भला-बुरा कहने लगा। क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध कर दिया। इसी समय चक्र से श्रीकृष्ण की एक अंगुली पर चोट लग गई। द्रौपदी ने उसी समय अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की अंगुली पर बांध दिया। ये देख श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को बहन मानकर उनकी रक्षा का वचन दिया। उसी वचन के चलते श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को दु:शासन के द्वारा चीर हरण होने से बचाया था।
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