
Somvati Amavasya Ki Katha: 15 जून को सोमवती अमावस्या है। हिंदू धर्म में इसका विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। जब अमावस्या सोमवार के दिन पड़ती है, तो उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं और पीपल के पेड़ की पूजा करती हैं। मान्यता है कि इस दिन पीपल के पेड़ की 108 परिक्रमा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है और पति-पत्नी के रिश्ते में मजबूती बनी रहती है। कई क्षेत्रों में इस परिक्रमा को 'भंवरी देना' भी कहा जाता है।
सोमवती अमावस्या के दिन सुहागिन महिलाएं पीपल के पेड़ के चारों ओर 108 फेरे लगाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से पति की आयु में वृद्धि होती है और परिवार पर आने वाले संकट दूर होते हैं। परिक्रमा के दौरान महिलाएं पीपल के पेड़ में कच्चा सूत या कलावा भी लपेटती हैं। साथ ही जल, कच्चा दूध, फूल और अन्य पूजा सामग्री अर्पित कर भगवान विष्णु और पीपल देव का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक साहूकार था जिसके सात बेटे और एक बेटी थी। उसने अपने सभी बेटों का विवाह कर दिया था, लेकिन उसकी बेटी के विवाह में लगातार बाधाएं आ रही थीं। साहूकार के घर एक साधु भिक्षा लेने आता था। वह साहूकार की बहुओं को हमेशा "सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद देता था, लेकिन बेटी को कोई आशीर्वाद नहीं देता था। एक दिन साहूकार की पत्नी ने इसका कारण पूछा। तब साधु ने बताया कि उसकी बेटी के भाग्य में विवाह के तुरंत बाद वैधव्य योग लिखा है। यह सुनकर साहूकार और उसकी पत्नी चिंतित हो गए और उपाय पूछा। साधु ने बताया कि सात समुद्र पार 'सोना' नाम की एक धर्मपरायण धोबिन रहती है। यदि उनकी बेटी जाकर उसके चरण स्पर्श करे और उसका आशीर्वाद प्राप्त करे, तो उसका दुर्भाग्य दूर हो सकता है।
साहूकार की बेटी अपनी भाभी के साथ सोना धोबिन से मिलने निकल पड़ी। रास्ते में उन्हें एक विशाल पीपल का पेड़ दिखाई दिया, जिसमें एक घोंसले में गिद्ध के बच्चे थे। उन्होंने देखा कि एक सांप गिद्ध के बच्चों की ओर बढ़ रहा है। साहूकार की बेटी ने साहस दिखाते हुए सांप को मार दिया और गिद्ध के बच्चों की जान बचा ली। जब गिद्धों की माता वहां पहुंची और पूरी घटना जानी, तो वह प्रसन्न हो गई। उसने साहूकार की बेटी को आशीर्वाद दिया और उसे समुद्र पार कराकर सोना धोबिन के घर तक पहुंचा दिया।
सोना धोबिन के घर पहुंचकर साहूकार की बेटी ने उसके घर के सभी कामों में मदद की। पहले तो धोबिन को आश्चर्य हुआ, लेकिन जब उसे पूरी बात पता चली तो वह बहुत प्रसन्न हुई। संयोग से उस दिन सोमवती अमावस्या थी। सोना धोबिन ने पूरे विधि-विधान से पीपल के पेड़ की पूजा की और उसकी 108 परिक्रमा की। इसके बाद उसने अपने व्रत और पूजा का पुण्य साहूकार की बेटी को समर्पित कर दिया। मान्यता है कि इसके प्रभाव से लड़की के जीवन से वैधव्य दोष समाप्त हो गया और उसका वैवाहिक जीवन सुखमय हो गया। तभी से सोमवती अमावस्या पर 108 परिक्रमा लगाने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।
1- कथा सुनना: परिक्रमा पूरी करने के बाद हाथ में फूल लेकर सोना धोबिन की कथा अवश्य सुनी जाती है।
2- अर्ध्य देना: पीपल के पेड़ में जल, कच्चा दूध, और काले तिल अर्पित करके ही फेरे शुरू किए जाते हैं।
3- रक्षा सूत्र: परिक्रमा करते समय पीपल के तने पर सूत या कलावा लपेटा जाता है।
हिंदू धर्म में पीपल के पेड़ को अत्यंत पवित्र माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पीपल में ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी त्रिदेवों का वास होता है। इसी वजह से पीपल की पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि पीपल के पेड़ की परिक्रमा करने और उसकी पूजा करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है, मानसिक शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
हिंदू धर्म, योग और ज्योतिष में 108 संख्या को बेहद शुभ और पवित्र माना जाता है। यह संख्या पूर्णता, आध्यात्मिकता और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 1 का अर्थ ईश्वर या परम सत्य, 0 का अर्थ शून्यता और 8 का अर्थ अनंतता से जोड़ा जाता है। इसलिए 108 परिक्रमा करना पूर्ण श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
सोमवती अमावस्या के दिन महिलाएं सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद पीपल के पेड़ के पास जाकर जल, कच्चा दूध, फूल और पूजा सामग्री अर्पित करती हैं। पूजा के दौरान पीपल के तने पर सूत या कलावा लपेटा जाता है और 108 परिक्रमा की जाती हैं। महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए भगवान विष्णु और पीपल देव का आशीर्वाद मांगती हैं।
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