Achala Ekadashi 2023: कब करें अचला एकादशी व्रत 15 या 16 मई को? जानें सही डेट और शुभ योगों के बारे में

Published : May 07, 2023, 04:25 PM IST
achala ekadashi 2023

सार

Achala Ekadashi 2023: ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अचला एकादशी कहते हैं। कुछ धर्म ग्रंथों में इसे अपरा एकादशी भी कहा गया है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा विशेष रूप से की जाती है, जिससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। 

उज्जैन. ज्योतिष शास्त्र में कुल 16 तिथियां बताई गई हैं। इनमें से एकादशी को सबसे पवित्र माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा की जाती है और व्रत भी किया जाता है। (Achala Ekadashi 2023 Date) हर महीने में दो एकादशी तिथि होती है, इस तरह एक साल में कुल 24 एकादशियां आती हैं। इनमें से हर एकादशी का एक अलग नाम और महत्व ग्रंथों में बताया गया है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अचला और अपरा कहा जाता है। आगे जानिए इस बार कब है अचला एकादशी व इस तिथि से जुड़ी अन्य खास बातें…

इस दिन किया जाएगा अचला एकादशी व्रत (Kab Kare Achala Ekadashi Vrat)
पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 14 मई, रविवार की रात 02:46 से शुरू होकर 15 मई, सोमवार की रात 01:03 तक रहेगी। चूंकि एकादशी तिथि का सूर्योदय 15 मई को होगा, इसलिए इस दिन अचला एकादशी का व्रत किया जाएगा। इस दिन उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र होने से गद नाम का शुभ योग दिन भर रहेगा। इसके अलावा प्रीति नाम का एक अन्य शुभ योग भी इस दिन बनेगा।

सूर्य करेगा राशि परिवर्तन
15 मई को सूर्य राशि परिवर्तन कर मेष से वृषभ में प्रवेश करेगा, इस राशि में पहले से ही शुक्र रहेगा। इस तरह वृषभ राशि में सूर्य और शुक्र की युति बन जाएगी। ये दोनों ही शुभ ग्रह हैं। इन दोनों ग्रहों की युति से सभी राशि वालों को शुभ फलों की प्राप्ति होगी। अचला एकादशी पर ये शुभ योग बनने से इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है।

जानें अचला एकादशी की कथा (Achala Ekadashi Ki Katha)
पुरातन समय में किसी देश में महिध्वज नामक धर्मात्मा राजा रहता था। उसका छोटा भाई ब्रजध्वज बड़ा ही क्रूर था। राज-पाठ पाने के लिए उसने एक दिन अपने बड़े भाई महिध्वज की हत्या कर और उसका शव जंगल में पीपल के नीचे दबा दिया। एक बार धौम्य ऋषि उस पेड़ के निकट से निकले तो उन्होंने अपने तपोबल से सब लिया और राजा के प्रेत को अचला एकादशी का व्रत करने को कहा। इस व्रत के प्रभाव से राजा का प्रेत दिव्य शरीर धारण कर स्वर्गलोक चला गया।


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