महाराष्ट्र के इस शहर में क्यों नहीं होता गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन? जानें वजह

Published : Sep 28, 2023, 02:58 PM IST
ganpati pule temple

सार

Unique Tradition Of Maharashtra: आम तौर पर पूरे देश में अनंत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन करने की परंपरा है, लेकिन महाराष्ट्र के एक शहर में ऐसा नहीं होता। यहां 10 दिन तक गणेशजी की विशेष पूजा तो होती है, लेकिन विसर्जन नहीं किया जाता। 

उज्जैन. भाद्रपद मास में 10 दिवसीय गणेश उत्सव (Ganesh Utsav 2023) मनाया जाता है। इसके बाद अनंत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन (Ganpati immersion 2023) बड़े ही धूम-धाम से किया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र का एक शहर ऐसा भी है जहां गणपति प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता। यहां भगवान श्रीगणेश का एक प्रसि्दध मंदिर भी है, जहां दूर-दूर से भक्त दर्शन करने आते हैं। जहां महाराष्ट्र में कहां है ये शहर और कौन-सा है ये प्रसिद्ध गणेश मंदिर…

प्रसिद्ध है रत्नागिरी का ये शहर
महाराष्ट्र (Maharashtra) के रत्नागिरि ज़िले (Ratnagiri district) में कोंकण तट पर अरब सागर से सटा हुआ एक छोटा सा शहर है गणपति पुले (Ganpati Pule) । पर्यटन की दृष्टि से ये शहर काफी खास है। यहां की प्राकृतिक हरियाली और शांत वातावरण लोगों को खूब भाता है। यहीं पर स्थित है भगवान श्रीगणेश का प्रसिद्ध मंदिर (Ganpati Pule Temple)। श्रीगणेश के इस प्रसिद्ध मंदिर के नाम पर ही शहर का नाम गणपति पुले रखा गया है। यहां गणेश उत्सव के दौरान भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।

यहां न तो गणपति स्थापना न विसर्जन
गणपतिपुले मंदिर के मुख्य पुजारी अभिजीत विनायक घनवटकर के अनुसार, इस शहर में गणेश उत्सव के दौरान घरों में प्रतिमाएं स्थापित नहीं की जाती। सभी लोग मंदिर में आकर ही भगवान श्रीगणेश की पूजा करते हैं। इन 10 दिनों में स्थानीय निवासियों को मंदिर में स्थापित प्राचीन प्रतिमा के पैर छूने का अवसर मिलता है। ये बहुत खास मौका होता है, इसलिए कोई भी स्थानीय निवासी इस मौके पर छोड़ना नहीं चाहता। इसलिए यहां गणेश चतुर्थी पर श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती है और न ही अनंत चतुर्दशी पर इसका विसर्जन होता है।

क्यों खास है ये मंदिर, जानें इतिहास? (Story Of Ganpati Pule Temple)
मंदिर में स्थापित गणेशजी की प्रतिमा स्वयंभू है यानी इसका किसी ने निर्माण नहीं किया बल्कि ये धरती में से प्रकट हुई है। इससे जुड़ी एक कथा भी है जो इस प्रकार है- मुगल काल के दौरान यहां बालमभट्ट भिड़े नाम के एक ग्राम प्रधान रहते थे। उस समय इस स्थान पर घना जंगल था। उनके पास एक गाय थी। उन्होंने देखा कि उनकी गाय में अचानक दूध देना बंद कर दिया। एक बार उन्होंने गाय का पीछा किया तो देखा कि उनकी गाय घने जंगल में एक पत्थर के ऊपर दूध से अभिषेक कर रही है। जब उन्होंने उस स्थान पर खुदाई करवाई तो वहां से भगवान श्रीगणेश की प्राचीन प्रतिमा निकली, जिसे भक्तों ने मंदिर में स्थापित कर दिया। इस तरह ये मंदिर अस्तित्व में आया।

हर इच्छा होती है पूरी
पुजारी घनवटकर के अनुसार, जो कोई भी भगवान श्रीगणेश से कुछ भी मांगता है, उसकी इच्छा जरूर पूरी होती है। भक्त अपनी मन्नतें पूरी करने के लिए इस पहाड़ के चारों ओर परिक्रम करते हैं, वे इस पूरे पर्वत को ही भगवान गणेश का स्वरूप मानते हैं। भले ही मंदिर 400-500 साल पहले अस्तित्व में आया है, लेकिन इस स्थान का उल्लेख मुद्गल पुराण में मिलता है।


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