कैलाश मानसरोवर के लिए नहीं जाना होगा चीन, अब भारत के रास्ते भक्त जा पाएंगे भगवान भोले के दरबार

Published : Jul 21, 2023, 12:50 PM ISTUpdated : Jul 21, 2023, 12:51 PM IST
Mount Kailash

सार

देवभूमि उत्तराखंड से कैलाश मानसरोवर की यात्रा और सुगम होने वाली है। पिथौरागढ़ के नाभीढांग से भारत-चीन बॉर्डर पर लिपुलेख दर्रे तक सड़क की कटाई का काम शुरू हो गया है। संभावना जताई जा रही है काम सितबंर तक पूरा कर लिया जाएगा।

उत्तराखंड.हिंदू धर्म में आस्था का प्रतीक और भगवान शिव का निवास स्थल कहे जाने वाले कैलाश पर्वत के दर्शन के लिए जाने वाले शिवभक्तों के लिए बड़ी खुशखबरी है। श्रद्धालुओं को अब दर्शन करने के लिए लंबे वक्त का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। शिवधाम यानी कैलाश पर्वत तक जाने के लिए उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से तैयार किया जा रहा रास्ता जल्द ही शुरू कर दिया जाएगा। अधिकारियों की मानें तो इस साल सितंबर के बाद रास्ते को खोले जाने की उम्मीद है।

सितंबर तक कार्य पूरा होने की उम्मीद

अधिकारियों ने बताया कि सीमा सड़क संगठन (BRO) ने पिथौरागढ़ जिलले के नाभीढांग में KMVN हट्स से भारत-चीन बॉर्डर पर लिपुलेख दर्रे तक सड़क काटने का काम शुरू कर दिया है। जो सितंबर तक पूरा हो जाएगा। BRO के डायमंड प्रोजेक्ट के मुख्य अभियंता विमल गोस्वामी ने कहा कि हमने नाभीढ़ांग में KMVN हट्स से लिपुलेख दर्रे तक करीब साढ़े छह किमी लंबी सड़क को काटने का काम शुरू कर दिया है। यदि मौसम सही रहा तो सितंबर तक काम पूरा कर लिया जाएगा। सड़क का काम पूरा होने के बाद साथ में ‘कैलाश व्यू प्वाइंट’ भी तैयार होगा।’

2019 में हुई थी आखिरी बार यात्रा 

गौरतलब है,कोरोना महामारी के कारण कैलाश मानसरोवर यात्रा चार सालों से स्थगित है। जिसके चलते उत्तराखंड पर्यटन विभाग लिपुलेख दर्रे से तीर्थयात्रियों को भगवान शिव का निवास स्थल माने जाने वाले कैलाश पर्वत की एक झलक दिखाने की संभवानाएं तलाशी गईं। बता दें,पुराना लिपुलेख शिखर तिब्बत के प्रवेश द्वार लिपुलेख दर्रे के पश्चिमी किनारे पर स्थित है। लिपुलेख दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा आखिरी बार 2019 में आयोजित की गई थी। इसे 2020 में कोविड-19 महामारी के कारण निलंबित कर दिया गया था हालांकि इस साल यात्रा फिर से शुरू हुई।, कैलाश मानसरोवर की यात्रा पूरी करने के लिए चीनी वीजा की जरुरत होती है और चीन द्वारा वीजा के नियमों को काफी कड़ा किया गया था। इसके साथ ही यात्रा का खर्चा भी लगातार बढ़ता जा रहा था। जिसे देखते हुए शिवभक्तों के लिए वैकल्पिक मार्ग तलाशने का काम किया गया।

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