धर्म ग्रंथों में सप्तपुरियों का वर्णन मिलता है। सप्तपुरी यानी भारत के सबसे प्राचीन 7 शहर। इनमें काशी का भी नाम है। काशी को मुक्तदायिनी भी कहते हैं। यहां विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग स्थापित है।
काशी उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में से एक है। काशी का एक नाम वाराणसी भी है। काशी को भारत के सबसे पुराने शहरों में से एक कहा जाता है। यहां अनेक प्राचीन मंदिर हैं, जहां रोज लाखों भक्त दर्शन करने आते हैं। इन मंदिरों में से सबसे प्रमुख है विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग। ये 12 ज्योतिर्लिंगों में से सातवें स्थान पर आता है। काशी में स्थित होने के कारण इस ज्योतिर्लिंग को काशी विश्वनाथ भी कहा जाता है। काशी गंगा नदी के तट पर बसा है, जिसके चलते यहां का महत्व और भी अधिक माना गया है। महाशिवरात्रि (8 मार्च 2024) के मौके पर जानिए काशी विश्वानाथ मंदिर से जुड़ी खास बातें…
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कईं बार तोड़ा और बनाया गया ये मंदिर
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग हजारों साल पुराना है। इससे जुड़ी अनेक मान्यताएं और परंपराए हैं। इस मंदिर का पहली बार किसने निर्माण करवाया, इस बात की जानकारी तो नहीं है लेकिन मुगल काल के दौरान इसे कईं बार तोड़ा गया बाद में हिंदू राजाओं ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। सबसे पहले वर्ष 1194 में मुहम्मद गौरी ने इसे तोड़ा था, इसके बाद 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने भी इसका विध्वंस किया। कईं सालों बाद अहिल्याबाई होल्कर ने 1777 में काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर के 5 मंडप भी अहिल्याबाई ने ही बनवाए थे। 1853 में पंजाब के राजा रणजीत सिंह ने 22 टन सोने से मंदिर के शिखरों को स्वर्णमंडित करवाया था। साल 2022 के अंत में इस मंदिर का कायाकल्प कर इसका विस्तार किया गया है, जिसे काशी कॉरीडोर नाम दिया गया है।
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ये है काशी विश्वनाथ की पौराणिक कथा (Kashi Vishwanath Ki Katha)
वैसे तो काशी विश्वनाथ से जुड़ी अनेक कथाएं प्रचलित हैं, उन्हीं में से एक कथा ये भी है कि ‘जब भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ तो महादेव पुन: कैलाश पर्वत पर आकर रहने लगे और माता पार्वती अपने पिता हिमालय के घर। ये बात देवी पार्वती को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने शिवजी से कहा कि ‘आप मुझे अपने घर लेकर चलिए।’ चूंकि कैलाश पर्वत पर रहना सहज नहीं था, इसलिए महादेव उन्हें लेकर काशी आ गए और यहीं विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।
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सप्तपुरियों में से एक है काशी
धर्म ग्रंथों में सप्तपुरियों का वर्णन मिलता है यानी भारत के 7 सबसे प्राचीन और पवित्र शहर। काशी भी इनमें से एक है। शिवपुराण के अनुसार प्रलयकाल में जब समस्त संसार का नाश हो जाता है, उस समय भी काशी अपने स्थान पर रहती है। प्रलय आने पर महादेव इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं। कहते हैं कि काशी में प्राण त्याग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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प्रसिद्ध हैं काशी के ये 12 नाम
18 पुराणों में से एक स्कंद पुराण में काशीखंड नाम का एक पूरा अध्याय है। इसमें काशी के 12 नाम बताए गए हैं। ये नाम हैं- काशी, वाराणसी, अविमुक्त क्षेत्र, आनंदकानन, महाश्मशान, रुद्रावास, काशिका, तपस्थली, मुक्तिभूमि, शिवपुरी, त्रिपुरारि राज नगरी और विश्वनाथ नगरी। काशी को घाटों का शहर भी कहते हैं। यहां कईं प्रसिद्ध घाट हैं- दशाश्वमेध घाट, मणिकार्णिका घाट, हरिश्चंद्र घाट और तुलसी घाट आदि।
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यहां मरने की आशा से आते हैं लोग
काशी में लोग मरने आते हैं, ये बात सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन ये सच है। काशी में मुक्ति भवन नाम का एक मकान हैं। जो लोग मरणासन्न स्थिति में होते हैं, उनके परिजन उन्हें यहां लेकर आते हैं और कमरा किराए पर रहकर रहते हैं। मान्यता है कि काशी में मृत्यु होने पर उनकी आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होगी।
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कैसे पहुंचे काशी विश्वनाथ?
- काशी में दो रेलवे जंक्शन है- वाराणसी जंक्शन और मुगल सराय जंक्शन। यह दोनों शहर से पूर्व की ओर 15 किमी दूर है। यह स्टेशन देश के प्रमुख रेल लाइनों से सीधे जुड़ा हुआ है। - काशी पूरे देश के प्रमुख राजमार्गों से सीधा जुड़ा हुआ है। राज्य के कई शहरों जैसे- लखनऊ, कानपुर और इलाहबाद आदि से बसें आसानी से मिल जाती है। - काशी में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो देश के प्रमुख शहरों दिल्ली, लखनऊ, मुम्बई, खजुराहो और कोलकाता आदि से सीधी उड़ानों के द्वारा जुड़ा है।
Disclaimer : इस आर्टिकल में जो भी जानकारी दी गई है, वो ज्योतिषियों, पंचांग, धर्म ग्रंथों और मान्यताओं पर आधारित हैं। इन जानकारियों को आप तक पहुंचाने का हम सिर्फ एक माध्यम हैं। यूजर्स से निवेदन है कि वो इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।
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