कहां खेलते हैं ‘जूतामार होली’, क्यों निकालते हैं ‘लाट साहब का जुलूस’?

Published : Mar 12, 2025, 07:36 PM IST
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सार

jutamar holi tradition: हमारे देश में होली से जुड़ी अनेक परंपराएं हैं। इनमें से कुछ परंपराएं तो बहुत ही अजीब है। ऐसी ही एक परंपरा उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में भी निभाई जाती है। यहां जूतामार होली खेलने की परंपरा है। 

Laat Sahab Ka Julus tradition: इस बार होली 14 मार्च, शुक्रवार को खेली जाएगी। होली से जुड़ी अनेक अजीबो-गरीब परंपरा हमारे देश में चली आ रही हैं। ऐसी ही एक परंपरा उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में भी निभाई जाती है, जिसे लाट साहब का जुलूस कहा जाता है। इस जुलूस के दौरान लोग जूते मारकर परंपरा पूरी करते हैं, इसलिए इसे जूतामार होली भी कहा जाता है। आगे जानिए क्या है ये परंपरा और इससे जुड़ी खास बातें…

क्यों निकालते हैं लाट साहब का जुलूस?

इतिहासकार नानक चंद्र मेहरोत्रा की पुस्तक शाहजहांपुर ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर में लाट साहब का जुलूस निकालने के बारे में जानकारी मिलती है। उसके अनुसार ये परंपरा 300 साल से भी ज्यादा पुरानी है। इस परंपरा में किसी एक व्यक्ति को भैंसागाड़ी पर बैठाकर उसका जुलूस निकाला जाता है। उस व्यक्ति को लाट साहब कहा जाता है। ये जुलूस शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए बाबा विश्वनाथ के मंदिर पर जाकर समाप्त होता है।

क्यों कहते हैं जूतामार होली?

भैंसागाड़ी पर जिस व्यक्ति को बैठाकर जुलूस निकाला जाता है, उसे लोग जूते-चप्पल फेंकर मारते हैं, इसलिए इस परंपरा को जूतामार होली भी कहा जाता है। कहते हैं इस परंपरा का शुरूआत नवाब अब्दुल्ला खां ने की थी। उनकी मौत के बाद भी ये परंपरा चली आ रही है। पहले इस जुलूस में हाथी, घोड़े और ऊंट आदि भी शामिल होते थे लेकिन समय के साथ सिर्फ भैंसागाड़ी का इस्तेमाल इसमें किया जाने लगा।

नाम में हुआ परिवर्तन

नवाब अब्दुल्ला द्वारा इस परंपरा को शुरू किया गया था, इसलिए इस जुलूस का नाम पहले नवाब साहब का जुलूस कहा जाता था लेकिन साल 1947 में दो समुदायों के बीच इस जुलूस को लेकर टकराब की स्थिति बन गई, जिसके चलते बाद में इस जुलूस का नाम में परिवर्तन इसे लाट साहब का जुलूस कर दिया गया। तब से आज तक इसे इसी नाम से जाना जाता है।

 

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