
Maharishi Valmiki Story: महर्षि वाल्मीकि को रामायण का रचयिता और संस्कृत का आदिकवि माना जाता है। उनके जीवन से जुड़ी एक कहानी काफी प्रचलित है, जिसके अनुसार वे पहले डाकू रत्नाकर थे। बाद में ऋषियों के संपर्क में आने के बाद उन्होंने तपस्या की और महर्षि बने। लेकिन दूसरी ओर, वाल्मीकि रामायण में उनके जन्म को लेकर एक अलग जानकारी मिलती है। ऐसे में सवाल उठता है कि महर्षि वाल्मीकि वास्तव में कौन थे और उनके बारे में ग्रंथ क्या बताते हैं…
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड के 96वें सर्ग में महर्षि वाल्मीकि अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि वे प्रचेता के दसवें पुत्र हैं। इस प्रसंग में वे भगवान राम के सामने सीता की पवित्रता के पक्ष में अपनी बात रखते हैं और अपने सत्यवादी होने का भरोसा दिलाते हैं। प्रचेता जल के देवता भगवान वरुण का ही एक नाम है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि वाल्मीकि रामायण देवता के पुत्र थे।
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महर्षि वाल्मीकि के डाकू से ऋषि बनने की कथा भी काफी लोकप्रिय है। इस कहानी के अनुसार, रत्नाकर नाम का एक व्यक्ति राहगीरों को लूटकर अपना जीवन चलाता था। एक दिन उसकी मुलाकात ऋषियों से हुई। उन्होंने उसे समझाया कि उसके गलत कामों का बोझ उसके परिवार के लोग नहीं उठाएंगे। इस बात से रत्नाकर को अपने कर्मों पर विचार करने की प्रेरणा मिली। इसके बाद उसने तपस्या शुरू की। लंबे समय तक ध्यान में लीन रहने के कारण उसके शरीर के चारों ओर दीमकों का टीला बन गया, जिसे संस्कृत में 'वाल्मीक' कहा जाता है। इसी से उनका नाम वाल्मीकि पड़ने की मान्यता प्रचलित हुई।
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महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि भी कहा जाता है जिसका अर्थ है संसार का पहला कवि। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने ही रामायण जैसे महाग्रंथ की रचना की जिसे संसार का पहला महाकाव्य कहा गया है। रामायण लिखने की प्रेरणा महर्षि वाल्मीकि को स्वयं भगवान ब्रह्मा से मिली थी। महर्षि वाल्मीकि भगवान श्रीराम के समकालीन थे। लव-कुश का जन्म इनके आश्रम में ही हुआ था।
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