
Varad Chaturthi Vrat Katha In HIndi: धर्म ग्रंथों के अनुसार शुक्ल और कृष्ण, दोनों पक्षों की चतुर्थी तिथि को भगवान श्रीगणेश की विशेष पूजा की जाती है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को दूर्वा और वरद चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस चतुर्थी का महत्व अनेक धर्म ग्रंथों में बताया गया है। इस बार वरद चतुर्थी का व्रत 16 अगस्त, रविवार को किया जाएगा। इस व्रत से जुड़ी एक रोचक कथा भी है जिसे सुनने के बाद ही इसका पूरा फल मिलता है। आगे पढ़ें वरद चतुर्थी की रोचक कथा…
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प्राचीन समय में अंग देश में अश्वसेन नाम के एक पराक्रमी और धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे दान-पुण्य, यज्ञ, व्रत और धर्म-कर्म में हमेशा आगे रहते थे। अपने साहस और युद्ध कौशल के बल पर उन्होंने अनेक राज्यों को जीत लिया था, इसलिए उनका यश दूर-दूर तक फैला हुआ था।
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कुछ समय बाद राजा अश्वसेन को एक भयंकर ज्वर (बुखार) हो गया। यह बीमारी इतनी गंभीर थी कि एक वर्ष तक उनका कोई इलाज काम नहीं आया। धीरे-धीरे उनका शरीर कमजोर हो गया और वे जीवन से निराश हो गए। दुखी होकर उन्होंने प्राण त्यागने का विचार बना लिया।
उसी समय महान ऋषि देवल मुनि उनके महल में पहुंचे। राजा ने उनका आदर-सत्कार किया और अपनी पीड़ा बताई। तब देवल मुनि ने ध्यान लगाकर राजा की समस्या का कारण जाना। उन्होंने कहा, “हे राजन! आपके राज्य में चतुर्थी व्रत की परंपरा समाप्त हो गई है। इसी कारण आप इस कष्टदायक रोग से पीड़ित हुए हैं। यह व्रत धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाला माना गया है। इसके बिना अन्य पुण्य कर्म भी अधूरे रह जाते हैं।”
राजा ने चतुर्थी व्रत का महत्व जानने की इच्छा जताई। तब देवल मुनि ने बताया कि उनके पिता असित मुनि भगवान गणेश के परम भक्त थे। उन्होंने देवल मुनि को गणेश मंत्र दिया और गणेशजी की आराधना करने का उपदेश दिया। देवल मुनि ने श्रद्धापूर्वक भगवान गणेश की पूजा और जप किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर गणेशजी ने उन्हें दर्शन दिए और जीवन में शांति तथा सफलता का आशीर्वाद दिया।
यह कथा सुनाकर देवल मुनि ने राजा अश्वसेन को भी गणेश मंत्र दिया और चतुर्थी व्रत करने की सलाह दी। कुछ समय बाद श्रावण शुक्ल चतुर्थी आई। राजा ने अपनी पूरी प्रजा के साथ विधि-विधान से दूर्वा गणपति (वरद चतुर्थी) व्रत किया और भगवान गणेश की पूजा की।
व्रत और गणेश आराधना के प्रभाव से राजा का भयंकर ज्वर पूरी तरह समाप्त हो गया। राज्य में सुख-समृद्धि बढ़ने लगी, लोग स्वस्थ और खुशहाल रहने लगे। इसके बाद राजा ने पूरे राज्य में चतुर्थी व्रत का प्रचार किया। जीवन के अंत में उन्होंने राजपाट अपने पुत्र को सौंप दिया और भगवान गणेश की भक्ति में लीन होकर परम शांति प्राप्त की।
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