श्रीकृष्ण बांसुरी ही क्यों बजाते हैं? बांसुरी की धुन सुनकर मोर, गायें-नदियां क्यों हो जाती थीं मोहित?

Published : Sep 03, 2026, 04:59 PM IST
Janmashtami 2026

सार

Why Krishna Plays Flute: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व इस बार 4 सितंबर, शुक्रवार को है। जब भी हम श्रीकृष्ण को याद करते हैं तो उनके हाथ में बांसुरी जरूर होती है। ये बांसुरी श्रीकृष्ण की पहचान की तरह है।

Krishna Flute Story: भगवान श्रीकृष्ण की पहचान उनके मोर मुकुट और बांसुरी के बिना अधूरी सी लगती है। कान्हा जब वृंदावन में बांसुरी बजाते थे, तो उसकी धुन सुनकर गोपियां ही नहीं, बल्कि गाय, पक्षी, मोर और यहां तक कि नदियां भी उनके मोहित हो जाती थीं। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में कृष्ण की बांसुरी की धुन और उससे प्रभावित वृंदावन की प्रकृति का बेहद सुंदर वर्णन मिलता है। सवाल यह है कि कृष्ण की बांसुरी को इतना खास क्यों माना जाता है? इसके पीछे उनकी वृंदावन लीलाओं और गहरी भक्ति से जुड़ी मान्यताएं हैं।

कृष्ण की बांसुरी का धार्मिक महत्व

बांसुरी को कृष्ण के सबसे प्रिय वाद्यों में माना जाता है। भगवान के जिस स्वरूप की कल्पना की जाती है, उसमें वे अक्सर हाथ में बांसुरी लिए दिखाई देते हैं। ब्रह्मसंहिता में भी गोविंद के बांसुरी बजाने वाले स्वरूप का वर्णन मिलता है। कृष्ण के लिए बांसुरी सिर्फ संगीत का साधन नहीं है। भक्त इसे भगवान और उनके भक्तों के बीच प्रेम का माध्यम मानते हैं। बांसुरी से निकलने वाली धुन को कृष्ण की ऐसी पुकार माना जाता है, जो सीधे भक्त के दिल तक पहुंचती है।

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बांसुरी की धुन सुनकर मोहित हो जाता था वृंदावन

श्रीमद्भागवत में कृष्ण के वन में गाय चराने जाने का वर्णन आता है। वे जब बांसुरी बजाते थे, तो उसकी धुन सुनकर वृंदावन का वातावरण जैसे ठहर जाता था। गोपियां कृष्ण की बांसुरी की प्रशंसा करती थीं। उन्हें आश्चर्य होता था कि आखिर इस बांसुरी ने ऐसा कौन सा पुण्य किया है कि उसे कृष्ण के होठों का स्पर्श मिलता है। मोर कृष्ण की बांसुरी सुनकर नाचने लगते थे, पक्षी शांत होकर उनकी धुन सुनते थे और गायें भी उस स्वर में डूब जाती थीं। नदियां तक कृष्ण की ओर मोहित हो जाती थीं।

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बांसुरी से जुड़ी सबसे सुंदर बात क्या है?

बांसुरी अंदर से खाली होती है। भक्ति की दृष्टि से इसी बात को बहुत सुंदर तरीके से समझाया जाता है। भक्त मानते हैं कि बांसुरी अपने भीतर कुछ नहीं रखती, इसलिए कृष्ण जब उसे अपने अधरों से लगाते हैं तो वही उनकी धुन का माध्यम बन जाती है। इसी से एक भाव जुड़ा है- जिस भक्त के अंदर अहंकार और अपनी इच्छाओं का बोझ कम हो जाता है, वह भगवान की इच्छा का बेहतर माध्यम बन जाता है।

गोपियों के लिए बांसुरी क्यों थी इतनी खास?

वृंदावन की गोपियों के लिए कृष्ण की बांसुरी की आवाज बेहद विशेष थी। जब कृष्ण सुबह गायों के साथ वन की ओर जाते या शाम को वापस लौटते, तो उनकी बांसुरी सुनकर गोपियां उन्हें देखने के लिए बाहर आ जाती थीं। श्रीमद्भागवत में इस भाव का वर्णन मिलता है। रास लीला से जुड़ी कथाओं में भी कृष्ण की बांसुरी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उसकी धुन सुनकर गोपियों का मन कृष्ण में लग जाता था। इसे भगवान के प्रति पूर्ण प्रेम और समर्पण का भाव माना जाता है।

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