2000 के दशक में टीम इंडिया की सबसे बड़ी कमजोरी तेज शुरुआत नहीं मिलना थी। टीम में अच्छे खिलाड़ी थे, लेकिन इनिंग की शुरुआत विस्फोटक दे, ऐसा कोई नहीं था। उसी समय वीरेंद्र सहवाग की एंट्री होती है और फिर क्रिकेट की परिभाषा बदल जाती है। टेक्निकल स्कूल की परिभाषा में वो फिट नहीं बैठते थे, लेकिन मैदान पर उनका खेल अलग लेवल का था। उनका साफ मंत्र था, पहली गेंद को भी उसी अंदाज में खेलो जैसे आखिरी को खेलते हैं। वो बिना किसी हड़बड़ाहट के सामान्य अंदाज में छक्के जड़ते थे। वो मेंटल फ्रीडम के मिशाल थे, जो शायद किसी भारतीय बल्लेबाज में दिखता हो। मुल्तान के 300 (टेस्ट), रांची के 319 (टेस्ट) और साउथ अफ्रीका के 219 (ODI) इसका उदाहरण है।