
Profitable Fruit Farming India: छत्तीसगढ़ का खूबसूरत हिल स्टेशन मैनपाट अब सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं, बल्कि एग्री-टूरिज्म और आधुनिक बागवानी के लिए भी नई पहचान बना रहा है। यहां के किसान पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर फलोद्यान की ओर कदम बढ़ा रहे हैं और बेहतर आय अर्जित कर रहे हैं। ऐसी ही सफलता की कहानी ग्राम बारिमा के किसान मनोज यादव की है, जिन्होंने नाशपाती की खेती को कमाई का मजबूत जरिया बना दिया। आज उनका बागान पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन चुका है।
मनोज यादव ने वर्ष 2017-18 में कमलेश्वरपुर स्थित शासकीय उद्यान रोपणी से नाशपाती के पौधे लेकर अपनी लगभग आधा हेक्टेयर खाली और पठारी जमीन पर करीब 200 पौधे लगाए। समय के साथ कुछ पौधे नष्ट हुए, लेकिन आज उनके बागान में 170 फलदार पेड़ मौजूद हैं।
मनोज बताते हैं कि उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों ने शुरुआत से ही तकनीकी मार्गदर्शन दिया। खाद प्रबंधन, पौधों की देखभाल और समय-समय पर निरीक्षण की मदद से उनका बागान लगातार बेहतर होता गया। इसी वैज्ञानिक सलाह और मेहनत का परिणाम है कि बंजर जमीन आज उनकी नियमित आय का स्रोत बन गई है।
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इस साल ओलावृष्टि और बाजार में बिक्री में देरी जैसी चुनौतियों के बावजूद मनोज यादव ने लगभग 260 कैरेट नाशपाती का उत्पादन किया। थोक बाजार में करीब 500 रुपये प्रति कैरेट की दर से बिक्री कर उन्हें लगभग 1.30 लाख रुपये की आय हुई। इसके अलावा उन्होंने पर्यटकों और स्थानीय ग्राहकों को सीधे नाशपाती बेचकर 25 से 30 हजार रुपये अतिरिक्त कमाए। इस तरह एक सीजन में उनकी कुल शुद्ध आय करीब 1.5 लाख रुपये रही। मनोज के अनुसार, पिछले वर्ष मौसम अनुकूल रहने पर इसी बागान से उन्हें 2.5 से 3 लाख रुपये तक का मुनाफा हुआ था।
मैनपाट के कुदारीडीह स्थित यह नाशपाती बागान अब एग्री-टूरिज्म का नया आकर्षण बन गया है। यहां रोजाना 100 से 250 पर्यटक पहुंचते हैं और पेड़ों से खुद नाशपाती तोड़ने का अनुभव लेते हैं। साथ ही 50 से 100 रुपये प्रति किलो की दर से ताजे फल भी खरीदते हैं। पर्यटकों से सीधे जुड़ने के कारण किसानों को बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता और बेहतर दाम मिलते हैं। मनोज यादव ने क्षेत्र के युवाओं और किसानों से अपील की है कि वे खाली पड़ी जमीन पर नाशपाती, लीची और अन्य फलदार पौधों की बागवानी अपनाएं।
उनका मानना है कि कम भूमि में भी अच्छी योजना, सरकारी सहयोग और आधुनिक तकनीक के जरिए खेती को लाभदायक व्यवसाय बनाया जा सकता है। जिला प्रशासन और उद्यानिकी विभाग भी किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देकर इसी दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।
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