
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने आज ओखला लैंडफिल साइट का निरीक्षण किया और यहां चल रहे कचरा निस्तारण तथा लैंडफिल रेमेडिएशन के काम की जमीनी स्थिति की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने मौके पर अधिकारियों से चल रहे ऑपरेशन की प्रगति की जानकारी ली और साफ निर्देश दिया कि काम की रफ्तार बनी रहनी चाहिए और तय समयसीमा के भीतर लक्ष्य पूरा किया जाए।
निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि दिल्ली को लंबे समय से परेशान कर रहे कूड़े के पहाड़ों से मुक्त कराना सरकार की स्पष्ट प्राथमिकताओं में शामिल है। इसके लिए लैंडफिल साइटों पर जमा पुराने कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण मिशन मोड में किया जा रहा है।
ओखला लैंडफिल दिल्ली की उन प्रमुख साइटों में शामिल है, जहां वर्षों से जमा पुराने कचरे को हटाने का काम चल रहा है। यहां बायोमाइनिंग और बायोरेमेडिएशन के जरिए पुराने यानी लिगेसी वेस्ट को अलग-अलग हिस्सों में प्रोसेस किया जाता है। सरकार का जोर सिर्फ कचरे के ढेर को हटाने तक सीमित नहीं है। पुराने कचरे से उपयोगी और रिसाइकिल होने वाली सामग्री को अलग करना, निष्क्रिय सामग्री का वैज्ञानिक इस्तेमाल करना और खाली हुई जमीन को दोबारा उपयोग में लाना भी इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से मौके पर काम की गति और तय लक्ष्यों को लेकर सीधे जवाबदेही सुनिश्चित करने को कहा। संदेश साफ है—काम चलता हुआ दिखना चाहिए और इसकी रफ्तार समयसीमा के हिसाब से बनी रहनी चाहिए।
आज ओखला लैंडफिल साइट पर पहुंचकर कूड़ा निस्तारण के काम की जमीनी प्रगति देखी और अधिकारियों के साथ आगे की कार्ययोजना की समीक्षा की।
लक्ष्य तय है, समयसीमा तय है और काम जमीन पर तेज गति से चल रहा है। हर दिन हजारों टन कूड़ा प्रोसेस किया जा रहा है।
दिल्ली को कूड़े के पहाड़ों से पूरी… pic.twitter.com/Y3sewF0aqA— Rekha Gupta (@gupta_rekha) October 3, 2026
ओखला के अलावा दिल्ली में भलस्वा और गाजीपुर लैंडफिल साइट भी लंबे समय से legacy waste management की चुनौती बनी हुई हैं। इन तीनों साइटों पर बायोमाइनिंग और वैज्ञानिक तरीके से कचरा निस्तारण का काम किया जा रहा है। दिल्ली सरकार ने अगस्त 2026 में बताया था कि ओखला, भलस्वा और गाजीपुर लैंडफिल से कुल करीब 2.16 करोड़ मीट्रिक टन कचरा प्रोसेस किया जा चुका है और करीब 100 एकड़ जमीन वापस हासिल की गई है। सरकार के मुताबिक ओखला में करीब 70 लाख मीट्रिक टन कचरा प्रोसेस कर लगभग 35 एकड़ जमीन रिक्लेम की गई थी। यह आंकड़ा बताता है कि लैंडफिल रेमेडिएशन अब केवल सफाई अभियान नहीं रहा, बल्कि शहरी जमीन को वापस हासिल करने और कचरा प्रबंधन की व्यवस्था को बदलने से जुड़ा बड़ा काम बन चुका है।
ओखला साइट पर चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यहां पुराने कचरे के साथ रोजाना पैदा होने वाले नए कचरे के प्रबंधन का दबाव भी बना रहता है। अगस्त 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक जमा कचरे का बड़ा हिस्सा बायोमाइनिंग और बायोरेमेडिएशन के जरिए प्रोसेस किया जा चुका था, लेकिन साइट पर रोजाना नया कचरा भी पहुंच रहा था।
यानी सिर्फ पुराने कूड़े का पहाड़ हटाना पर्याप्त नहीं है। दिल्ली में हर दिन पैदा होने वाले नए कचरे को भी समय पर प्रोसेस करना जरूरी है, वरना एक तरफ पुराना पहाड़ घटेगा और दूसरी तरफ नया कचरा जमा होता रहेगा। इसी चुनौती को देखते हुए सरकार अब पुराने legacy waste को हटाने के साथ-साथ नए कचरे के निस्तारण और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दे रही है।
दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती @gupta_rekha ने आज ओखला लैंडफिल साइट का निरीक्षण कर कूड़ा निस्तारण कार्य की प्रगति का जायजा लिया। उन्होंने अधिकारियों के साथ समीक्षा करते हुए तय समयसीमा के अनुसार काम में तेजी बनाए रखने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि दिल्ली को कूड़े के पहाड़ों… pic.twitter.com/F2F3vkcnDQ
— Asianetnews Hindi (@AsianetNewsHN) October 3, 2026
लैंडफिल की सफाई का काम कागज पर तय लक्ष्य के मुताबिक करना आसान नहीं है। भारी मात्रा में कचरे की खुदाई, उसकी छंटाई, बायोमाइनिंग, प्रोसेसिंग और अलग-अलग सामग्री का निस्तारण लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। 2026 के मानसून के दौरान दिल्ली की लैंडफिल साइटों पर बायोमाइनिंग की रफ्तार प्रभावित होने की रिपोर्ट भी सामने आई थी। अगस्त में ओखला में रोजाना बायोमाइनिंग की औसत क्षमता में काफी गिरावट दर्ज की गई थी। ऐसे में मुख्यमंत्री का आज का निरीक्षण सिर्फ औपचारिक दौरा नहीं माना जा सकता। काम की रफ्तार बनाए रखने और तय समयसीमा को लेकर अधिकारियों पर निगरानी बढ़ाने का सीधा संकेत है।
लैंडफिल से कचरा हटने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि लंबे समय से कचरे के ढेर के नीचे दबे शहरी भू-भाग को दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है। अगस्त में दिल्ली सरकार ने बताया था कि तीनों प्रमुख लैंडफिल साइटों पर काम के बाद करीब 100 एकड़ जमीन रिक्लेम की जा चुकी है।
केंद्र सरकार भी लैंडफिल रेमेडिएशन को वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाने और रिक्लेम की गई जमीन का सार्वजनिक उपयोग सुनिश्चित करने पर जोर देती रही है। मई 2026 में भलस्वा लैंडफिल की समीक्षा के दौरान करीब 43 एकड़ जमीन रिक्लेम किए जाने की जानकारी दी गई थी।
दिल्ली के लिए इसका मतलब सिर्फ कूड़े के पहाड़ का आकार कम होना नहीं है। जमीन की वापसी, प्रदूषण के जोखिम में कमी और भविष्य में कचरा प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था—इन तीनों पहलुओं पर इसका असर पड़ सकता है।
ओखला लैंडफिल के निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अधिकारियों को काम की गति बनाए रखने और तय समयसीमा का पालन करने के निर्देश दिए। सरकार की प्राथमिकता अब यह है कि पुराने कचरे के निस्तारण का काम मिशन मोड में आगे बढ़े और दिल्ली को उसके कूड़े के पहाड़ों से धीरे-धीरे मुक्त किया जा सके। हालांकि, असली चुनौती केवल मौजूदा कचरा हटाना नहीं है। दिल्ली में हर दिन पैदा होने वाले नए कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण, पर्याप्त प्रोसेसिंग क्षमता और लैंडफिल पर दोबारा दबाव न बनने देना भी उतना ही जरूरी होगा।
यही वजह है कि ओखला में चल रहा काम दिल्ली की व्यापक waste management strategy का एक अहम हिस्सा है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद जमीनी स्तर पर काम की रफ्तार कितनी बनी रहती है और तय लक्ष्य किस समय तक हासिल होता है।
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