Hydrogen Train: 10वीं की Chemistry से निकली टेक्नोलॉजी! आज उसी से दौड़ेगी भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन

Published : Jul 17, 2026, 11:44 AM IST
Hydrogen Train in India

सार

Hydrogen Train in India: भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन आज जींद से शुरू होगी। जानिए इलेक्ट्रोलिसिस, फ्यूल सेल, ग्रीन हाइड्रोजन, इसकी टेक्नोलॉजी, फायदे और चुनौतियां...

India First Hydrogen Train: भारतीय रेलवे के इतिहास में आज 17 जुलाई का दिन बेहद खास है। हरियाणा के जींद स्टेशन से देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआत होने जा रही है। इस ट्रेन को चलाने के लिए न डीजल की जरूरत है और न ही ओवरहेड बिजली की तारों की। यह अपनी बिजली खुद बनाती है और चलते समय धुएं की जगह सिर्फ पानी की भाप छोड़ती है। अगर आपको 10वीं की साइंस की किताब में पढ़ा इलेक्ट्रोलिसिस याद है, तो यह वही टेक्नोलॉजी, जिससे हाइड्रोजन ट्रेन दौड़ेगी। जानिए हाइड्रोजन ट्रेन क्या है, 10वीं की केमेस्ट्री से इसका क्या कनेक्शन है...

भारत में पहली हाइड्रोजन ट्रेन कहां से कहां तक चलेगी?

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा के जींद से सोनीपत के बीच करीब 89 किलोमीटर के रूट पर चलेगी। यह ट्रेन एक दिन में दो राउंड ट्रिप करेगी। कुल सफर करीब 356 किलोमीटर होगा। ट्रेन में करीब 2600 यात्रियों के बैठने की क्षमता होगी। ट्रेन अपने साथ लगभग 440 किलोग्राम हाइड्रोजन लेकर चलेगी, जिसमें से रोजाना करीब 300 किलोग्राम ईंधन इस्तेमाल होने का अनुमान है।

हाइड्रोजन ट्रेन क्या है?

हाइड्रोजन ट्रेन एक ऐसी ट्रेन होती है, जो हाइड्रोजन गैस से बिजली बनाकर चलती है। इसमें डीजल इंजन की जगह फ्यूल सेल सिस्टम लगा होता है। फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और हवा की ऑक्सीजन आपस में मिलती हैं। इस प्रक्रिया से बिजली बनती है, जो ट्रेन के मोटर को चलाती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें कार्बन वाला धुआं नहीं निकलता। आखिर में सिर्फ पानी और थोड़ी गर्मी बचती है।

10वीं की केमेस्ट्री का क्या कनेक्शन है?

स्कूल में आपने पढ़ा होगा कि पानी (H₂O) दो गैसों से मिलकर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन बनता है। अगर पानी में बिजली का करंट पास किया जाए, तो यह दोबारा इन दोनों गैसों में टूट जाता है। इस प्रक्रिया को इलेक्ट्रोलिसिस (Electrolysis) कहते हैं। आज दुनिया में ग्रीन हाइड्रोजन बनाने के लिए इसी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। यानी जो प्रयोग कभी स्कूल की किताबों में था, वही अब रेलवे की नई ताकत बन रहा है।

हाइड्रोजन की खोज कैसे हुई?

हाइड्रोजन की कहानी करीब 250 साल पुरानी है। 1776 में ब्रिटिश वैज्ञानिक हेनरी कैवेंडिश ने एक प्रयोग के दौरान एक नई गैस की पहचान की। बाद में फ्रांस के वैज्ञानिक एंटोइन लावोज़िए ने इसका नाम Hydrogen रखा। Hydro का मतलब पानी और Gen का मतलब पैदा होना। यानी पानी से बनने वाली गैस।

फ्यूल सेल कैसे बनाता है बिजली?

टैंक में हाइड्रोजन भरी रहती है। बाहर की हवा से ऑक्सीजन ली जाती है। दोनों फ्यूल सेल में मिलते हैं। इससे बिजली बनती है। यही बिजली ट्रेन के मोटर को चलाती है। इस पूरी प्रक्रिया में धुआं नहीं निकलता, बल्कि सिर्फ पानी की भाप बनती है। यही वजह है कि इसे ZET (Zero Emission Technology) कहा जाता है।

अगर इतना अच्छा है, तो हर ट्रेन हाइड्रोजन पर क्यों नहीं चलती?

असल चुनौती ट्रेन चलाने में नहीं, बल्कि हाइड्रोजन बनाने और स्टोर करने में है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, 1 किलो हाइड्रोजन बनाने में करीब 50 यूनिट बिजली खर्च हो सकती है। इसे बहुत ज्यादा दबाव में स्टोर करना पड़ता है। इसके लिए अलग फ्यूलिंग स्टेशन और खास सुरक्षा व्यवस्था चाहिए। फिलहाल इसकी लागत बैटरी और डीजल दोनों से ज्यादा पड़ती है। यानी तकनीक शानदार है, लेकिन अभी सस्ती नहीं है।

दुनिया में हाइड्रोजन ट्रेन कहां-कहां चलती हैं?

दुनिया के कई देशों ने हाइड्रोजन ट्रेन पर काम किया है। जर्मनी ने 2018 में पहली कमर्शियल हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन शुरू की थी। जापान ने 2022 में इसकी टेस्टिंग शुरू की। चीन और अमेरिका भी इस तकनीक पर काम कर रहे हैं। हालांकि, कुछ देशों ने बाद में बैटरी ट्रेनों को ज्यादा किफायती मानते हुए उन्हें प्रॉयरिटी देना शुरू किया।

भारत के लिए क्यों है अहम?

भारत अभी ग्रीन हाइड्रोजन मिशन पर तेजी से काम कर रहा है। ऐसे रूट जहां बिजली की लाइन बिछाना मुश्किल है या डीजल इंजन ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं, वहां भविष्य में हाइड्रोजन ट्रेन एक बेहतर विकल्प बन सकती है। अगर जींद-सोनीपत रूट का यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले समय में कई दूसरे रेलवे रूट पर भी ऐसी ट्रेनें देखने को मिल सकती हैं।

सोर्स: भारतीय रेलवे, रेल मंत्रालय, The Indian Express

डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल भारतीय रेलवे, रेल मंत्रालय, उपलब्ध आधिकारिक जानकारी और मीडिया रिपोर्ट्स जैसे, The Indian Express समेत अन्य सार्वजनिक सोर्स के आधार पर तैयार किया गया है। वास्तविक संचालन, तकनीकी बदलाव या सरकारी फैसलों के अनुसार इनमें समय-समय पर बदलाव संभव है। किसी भी आधिकारिक घोषणा या अपडेट के लिए भारतीय रेलवे और संबंधित सरकारी विभागों की आधिकारिक वेबसाइट और नोटिस जरूर देखें।

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