भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषि पंचमी कहते हैं। इस दिन महिलाएं व्रत करती हैं। यह व्रत ज्ञात-अज्ञात पापों का दोष दूर करने के लिए किया जाता है। इस बार यह व्रत 3 सितंबर, मंगलवार को है।
उज्जैन. धर्म शास्त्रों के अनुसार, ऋषि पंचमी का व्रत स्त्री व पुरुष दोनों कर सकते हैं, लेकिन वर्तमान में यह व्रत केवल महिला प्रधान ही माना जाता है। स्त्रियों से रजस्वला अवस्था में घर के बर्तन आदि का स्पर्श हो जाने से लगने वाले पाप को दूर करने के लिए यह व्रत किया जाता है।
इस व्रत में मुख्य रूप से सप्तर्षियों सहित अरुंधती का पूजन किया जाता है। इसलिए इसे ऋषि पंचमी कहते हैं। महिलाएं इस दिन हल से उत्पन्न अनाज व सब्जी का भोजन नहीं करतीं। सिर्फ एक समय भोजन कर सकते हैं। इस व्रत में नमक का सेवन वर्जित है।
ये है व्रत विधि
इस दिन व्रती (व्रत करने वाली महिला) सुबह से दोपहर तक उपवास करके किसी नदी या तालाब पर जाएं। वहां अपामार्ग (आंधीझाड़ा) से दांत साफ करें और शरीर पर मिट्टी लगाकर स्नान करें।
इसके बाद पंचगव्य (गाय का गोबर, मूत्र, दूध, दही और घी) का सेवन करें। इसके बाद घर आकर गोबर से पूजा का स्थान लीपें उसके ऊपर मिट्टी या तांबे का कलश स्थापित करके उसे कपड़े से ढंककर उसके ऊपर तांबे अथवा मिट्टी के बर्तन में जौ भरकर रखें।
पंचरत्न, फूल, गंध और चावल आदि से पूजन करें। यह संकल्प लें- अमुक गोत्रा (अपना गोत्र बोलें) अमुक देवी (अपना नाम लें) अहं मम आत्मनो रजस्वलावस्थायां गृहभाण्डादिस्पर्शदोषपरिहारार्थं अरुन्धतीसहितसप्तर्षिपूजनं करिष्ये।
पूजन के बाद कलश आदि पूजन सामग्री को ब्राह्मण को दान कर दें व ब्राह्मण को भोजन कराकर ही स्वयं भोजन करें।
कलश के पास ही अष्टदल कमल बनाकर उसके दलों में अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि ऋषियों व अरुंधती का पूजन करना चाहिए।
इस व्रत में नमक का प्रयोग वर्जित है। हल से जुते हुए खेत का अन्न खाना वर्जित है। दिन में केवल एक ही बार भोजन करना चाहिए।
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