कभी परिवार का खर्च चलाने को सड़कों पर बेंचता था घास, अब दर्जनों बेसहारों के लिए सहारा बना यह शख्स

Published : Dec 03, 2019, 01:58 PM ISTUpdated : Dec 03, 2019, 02:15 PM IST
कभी परिवार का खर्च चलाने को सड़कों पर बेंचता था घास, अब दर्जनों बेसहारों के लिए सहारा बना यह शख्स

सार

कभी परिवार का खर्च चलाने के लिए बचपन से ही खेतों से घास काटकर सड़क पर बेंचने वाला शख्स आज दर्जनों बेसहारों के लिए सहारा बन गया है। यूपी के अयोध्या के रहने वाले राजन पांडेय एक दर्जन अनाथ बच्चों की पढ़ाई व अन्य खर्च उठा रहे हैं

अयोध्या(Uttar Pradesh ). कभी परिवार का खर्च चलाने के लिए बचपन से ही खेतों से घास काटकर सड़क पर बेंचने वाला शख्स आज दर्जनों बेसहारों के लिए सहारा बन गया है। यूपी के अयोध्या के रहने वाले राजन पांडेय एक दर्जन अनाथ बच्चों की पढ़ाई व अन्य खर्च उठा रहे हैं। राजन पांडेय के इस कार्य की पूरे क्षेत्र में चर्चा है। hindi.asianetnews.com ने राजन पांडेय से बात की। इस दौरान उन्होंने अपने संघर्षों की कहानी बयां की। 

अयोध्या के कुमारगंज इलाके के रहने वाले राजन पांडेय गरीब बच्चों व परिवारों की मदद अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। उन्हें अगर सूचना मिलती है कि कहीं कोई संकट में है तो राजन पांडेय मचल उठते हैं। इसी ज़ज्बे के साथ वह पिछले 5-6 सालों से पूरे जनपद में तकरीबन सैकड़ों असहाय लोगों की मदद कर चुके हैं। 

बेहद दयनीय थी घर की आर्थिक स्थिति 
राजन पांडेय ने बताया, "मैं फैजाबाद जिले के कुमारगंज थाना क्षेत्र के शिवनाथपुर गांव का रहने वाला हूं। मेरे पिता राम सरदार पांडेय एक मामूली किसान थे। हम 3 भाई थे। पढ़ाई से लेकर घर का खर्च बेहद तंगी में चल रहा था। जब मै 6 साल का हुआ तो गांव के प्राथमिक पाठशाला में दाखिला करा दिया गया। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी। जिससे पढ़ाई लिखाई ठीक से नहीं हो पाती थी।"

स्कूल से छूटने के बाद सड़क के किनारे बेंचते थे घास 
राजन ने बताया, स्कूल से छूटने के बाद मैं खेतों से घास काट कर पास के पास के बाजार में बेचने जाया करता था। इससे 10 या 20 पैसे मिलते थे। इस पैसे से खाने के लिए कुछ चीजें आ जाती थी। इन सब में इतना टाइम निकल जाता था कि ठीक से पढ़ाई भी नहीं हो पाती थी।

ऐसे मिला रास्ता और बदल गई जिंदगी 
राजन बताते हैं, जब मै 17 साल का था उस समय मेरी पहचान आचार्य नरेन्द्रदेव कृषि विश्वविद्यालय कुमारगंज के प्रोफ़ेसर डॉ. जे. एन. तिवारी से हुई। वह मेरी  मेहनत देखकर काफी प्रभावित रहते थे। उस समय यूनिवर्सिटी में एक निर्माण के दौरान कुछ पेड़ काटे जाने थे। प्रोफेसर साहब के प्रयास से मुझे उन पेड़ों को कटवाने का ठेका मिला। नीलामी के लिए मुझे 5 हजार रु. दोस्तों-रिश्तेदारों से कर्ज लेकर यूनवर्सिटी में जमा करना पड़ा। पेड़ काट कर बेचने पर मुझे लगभग 30 हजार रू. मिले। जिसके बाद ऐसा लगा मानो सपनो को पंख लग गए हों। 

दिन रात मेहनत कर पूरी की ये शर्त तो बदली लाइफ 
राजन बताते हैं कि मुझे आज भी याद है 03 मार्च 1998 को प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. रोमेश भंडारी यूनिवर्सिटी आने वाले थे। उसके लिए सड़क पर हुए गढढों में मिट्टी डालना था। जब मुझे जानकारी हुई तो मैं वहां के निदेशक निर्माण डॉ. आर. एन. दीक्षित से मिला लेकिन उन्होंने मुझे डांट कर भगा दिया। वहज ये थी कि उस समय तक मुझे कोई जानता नहीं था और काम जल्द पूरा होने के लिए बड़े ठकेदार को काम दिए जाने की योजना थी। हालांकि काफी मिन्नतों के बाद ये काम मुझे मिल गया। उस समय मेरे सामने शर्त रखी गई कि 4 दिन बाद राज्यपाल का दौरा है, उससे पहले काम पूरा होना चाहिए। मैंने वह काम 24 घंटे में ही पूरा कर लिया। इसमें मुझे लगभग 1 लाख का फायदा हुआ। इसके बाद मेरी इमेज अच्छी बन गई। 

लगभग एक दर्जन अनाथ बच्चों का कर रहे पालन 
राजन पांडेय इस समय लगभग एक दर्जन से अधिक अनाथ बच्चों का पालन पोषण कर रहे हैं। उनके रहने-खाने से लेकर पढ़ाई का सारा खर्च वह खुद ही उठाते हैं। उनके इस काम में उनकी पत्नी डॉ तृप्ति पांडेय व तीनो बेटे अमित,अंकित व अर्पित मदद करते हैं। राजन इस समय बीकापुर इलाके के भावापुर गाँव में चार, जयराजपुर गांव में 6 अनाथ बच्चों का पालन कर रहे हैं। इन बच्चों के मां-बाप गुजर चुके हैं। इसके आलावा भी वह आधा दर्जन से अधिक गरीब परिवारों की जिम्मेदारी उठाते हैं। 

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