
महाबलीपुरम: मोदी और शी जिनपिंग की 11 अक्टूबर को मुलाकात होने वाली है। इस मुलाकात की खास बात यह है कि यह मीटिंग इस बार दिल्ली में नहीं बल्कि तमिलनाडू के महाबलीपुरम में होने वाली है। मोदी और जिनपिंग की यह दूसरी अनौपचारिक मुलाकात है।
आज हम आपको बताने वाले हैं कि आखिर क्या वजह है कि इस बार जिनपिंग महाबलीपुरम आनेवाले है और आखिर इस जगह का चीन के साथ क्या रिश्ता है? बात दें कि चीन का महाबलीपुरम से 2000 साल पुराना बहुत ही गहरा रिश्ता हैं, जिसके चलते मोदी ने इस बार यहां मुलाक़ात करने के फैसला किया है।
क्यों हो रही है महाबलीपुरम में ही मुलाकात?
इस बार महाबलीपुरम को मुलाकात के लिए क्यों चुना गया इसकी भी खास वजह है। दरअसल, चीन और महाबलीपुरम (ममल्लापुरम) के बीच 2000 साल पुराने व्यापारिक और ऐतिहासिक संबंध हैं। जी हां, चीन के भारत से संबंध आज से नहीं बल्कि 2000 साल पुराने हैं और चीन में बौद्ध धर्म के प्रसार की शुरुआत भी महाबलीपुरम से ही हुई थी। कहा जाता है कि जब दक्षिण भारत में पल्लव वंश का राज था तब से चीन के राजदूत भारत आते रहें हैं। चीन के प्रसिद्ध भिक्षु ह्नेन त्सांग भी भारत आए थे। यहां वे कांचीपुरम और महाबलीपुरम घूमने आए थे। आए दिन खुदाई में यहां से चीनी सिक्के, मिट्टी के बरतन जैसी चींजे मिलती रही हैं जो इस बात को स्पष्ट करती हैं कि भारत और चीन के कई साल पुराने तार जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि इस बार राजधानी में मुलाकात करने के बजाय महाबलीपुरम में मिलने का फैसला लिया गया है।
महाबलीपुरम से हो सकती है भारत-चीन संबंध में नई शुरुआत
भले ही भारत और चीन के कूटनीतिक संबंध अच्छे न रहें हो पर व्यापार के मामले में दोनो ही देश एक दूसरे के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। इस नजर से भारत और चीन की इस मुलाकात से दोनों देशों के संबंधों को एक नई दिशा मिल सकती है।
मोदी और जिनपिंग की मुलाकात इस समय हो रही है जब भारत ने 370 की हटा दिया है और पाकिस्तान इससे काफी बौखलाया हुआ है।
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