टोरंटो में महिला बलूच एक्टिविस्ट की संदिग्ध मौत, 2016 में पाक के अत्याचारों से भाग कर आई थी कनाडा

Published : Dec 22, 2020, 04:03 PM IST
टोरंटो में महिला बलूच एक्टिविस्ट की संदिग्ध मौत, 2016 में पाक के अत्याचारों से भाग कर आई थी कनाडा

सार

बलूच एक्टिविस्ट करीमा बलूच कनाडा के हार्बरफ्रंट में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई । करीमा बलूच ने साल 2016 में पाकिस्तान से भागकर कनाडा में शरण ली थी। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, पुलिस ने करीमा का शव टोरंटो में एक झील के किनारे पाया।

टोरंटो. बलूच एक्टिविस्ट करीमा बलूच कनाडा के हार्बरफ्रंट में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई । करीमा बलूच ने साल 2016 में पाकिस्तान से भागकर कनाडा में शरण ली थी। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, पुलिस ने करीमा का शव टोरंटो में एक झील के किनारे पाया। करीमा बलूच के पति हम्माल हैदर और भाई ने शव की पहचान की है। फिलहाल शव को पुलिस कस्टडी में रखा गया है। करीमा साल 2016 में कुछ दोस्तों और बलूच कार्यकर्ताओं की मदद से बलूचिस्तान से भागकर कनाडा गई थीं। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में उनकी जान को खतरा है। 

करीमा कनाडा में बसने वाले पूर्व पाकिस्तानी सेना अधिकारियों की एक कठोर आलोचक थीं और बलूचिस्तान की आजादी के सबसे मुखर प्रस्तावकों में से एक थीं। 2016 में ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए रिकॉर्ड किया हुआ 'रक्षा बंधन संदेश' भेजा था। करीमा की मौत के बाद बलूच नेशनल मूवमेंट (बीएनएम) ने 40 दिनों के शोक का एलान किया है। कनाडा में निर्वासन में रह रहे बीएनएम नेता और बलूच छात्र संगठन (BSO) के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि करीमा बलूच की शहादत बलूच राष्ट्र और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए बहुत बड़ी क्षति है। 

बलूच राष्ट्रीय आंदोलन ने घोषित किया 40 दिन का शोक 
बीएनएम के प्रवक्ता के बयान में कहा गया, करीमा की मृत्यु के साथ, हमने एक दूरदर्शी नेता और एक राष्ट्रीय प्रतीक खो दिया है। बलूच राष्ट्रीय आंदोलन ने अपने नेता करीमा बलूच की आकस्मिक मृत्यु को लेकर 40 दिनों का शोक घोषित किया है और सभी क्षेत्रों को 40 दिनों के लिए अन्य गतिविधियों को निलंबित करने का निर्देश दिया गया है। बलूचिस्तान में करीमा की लोकप्रियता का बढ़ना उनकी जान के लिए खतरा बनने लगा था। वह पाकिस्तानी सरकार और सेना की आंखों में खटकने लगी थीं। उन्होंने पाकिस्तानी सेना द्वारा बलूचिस्तान में किए जाने वाले मानवाधिकार उल्लंघन के बारे में संयुक्त राष्ट्र में भी आवाज उठाई थी।  
 

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