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आखिर 13 जनवरी को ही क्यों मनाई जाती है लोहड़ी, ये है इसके पीछे का मुख्य कारण

First Published Jan 13, 2021, 10:28 AM IST
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लाइफस्टाइल डेस्क : मकर संक्रांति से एक दिन पहले पंजाबियों का खास त्योहार लोहड़ी मनाया जाता है। इस दिन लोग लकड़ी जलाकर उसके आसपास घूमते है और मक्का, मूंगफली और रेवड़ी उसमें डालते हैं। इस दिन लोग अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के यहां मिठाइयां और शुभकामनाएं भेजते हैं और बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं। इस बार संक्रांति तो 15 तारीख को मनाई जा रही है, लेकिन लोहड़ी 13 जनवरी (lohri 2021) को मनाई जा रही है। अक्सर हमने देखा है कि भारत में हर पर्व अलग-अलग तारीख को मनाया जाता है। दिवाली होली का कोई फिक्स दिन नहीं है। लेकिन लोहड़ी हर साल 13 जनवरी को ही मनाई जाती है। इसके पीछे क्या कारण है आइए आपको बताते हैं।

उत्तर भारत के साथ-साथ पूरे देश में लोहड़ी का पर्व बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। हर जगह लोहड़ी को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नाम से बुलाया जाता है। पंजाब के कुछ इलाकों में इसे लोई भी कहते हैं, तो कुछ जगहों पर इसको लोह और तिलोड़ी भी कहा जाता है।

उत्तर भारत के साथ-साथ पूरे देश में लोहड़ी का पर्व बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। हर जगह लोहड़ी को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नाम से बुलाया जाता है। पंजाब के कुछ इलाकों में इसे लोई भी कहते हैं, तो कुछ जगहों पर इसको लोह और तिलोड़ी भी कहा जाता है।

लोहड़ी फसल की बुआई और उसकी कटाई से जुड़ा त्योहार है, जो पौष-माघ के महीने में कड़कती ठंड के बीच में हर साल 13 तारीख को मनाया जाता है। इसके अगले दिन नई साल की पहली सुबह होती है। इस दिन फसलों की पूजा की जाती है और गन्ने की फसल की कटाई होती है। 

लोहड़ी फसल की बुआई और उसकी कटाई से जुड़ा त्योहार है, जो पौष-माघ के महीने में कड़कती ठंड के बीच में हर साल 13 तारीख को मनाया जाता है। इसके अगले दिन नई साल की पहली सुबह होती है। इस दिन फसलों की पूजा की जाती है और गन्ने की फसल की कटाई होती है। 

बताया जाता है कि लोहड़ी की रात को सबसे सर्द और लंबी रात होती है। इसलिए शाम के समय खुली जगहों पर लोहड़ी जलाई जाती है और उसमें मूंगफली, रेवड़ी, गजक, तिल और रवि की फसल डाली जाती है और फिर इसकी परिक्रमा की जाती है।

बताया जाता है कि लोहड़ी की रात को सबसे सर्द और लंबी रात होती है। इसलिए शाम के समय खुली जगहों पर लोहड़ी जलाई जाती है और उसमें मूंगफली, रेवड़ी, गजक, तिल और रवि की फसल डाली जाती है और फिर इसकी परिक्रमा की जाती है।

कहा जाता है कि ऐसा करने से सूर्य और अग्नि देव खुश होते हैं और उनके आशीर्वाद से आने वाली फसल अच्छी होती है। लोहड़ी की आग के पास लोकगीत गाते हुए लोग दुल्ला भट्टी को याद करते हैं। जिन्होंने जंगल में आग जलाकर सुंदरी और मुंदरी नाम की दो गरीब लड़कियों की शादी करवाई थी।

कहा जाता है कि ऐसा करने से सूर्य और अग्नि देव खुश होते हैं और उनके आशीर्वाद से आने वाली फसल अच्छी होती है। लोहड़ी की आग के पास लोकगीत गाते हुए लोग दुल्ला भट्टी को याद करते हैं। जिन्होंने जंगल में आग जलाकर सुंदरी और मुंदरी नाम की दो गरीब लड़कियों की शादी करवाई थी।

जी हां, लोहड़ी पर दुल्ला भट्टी की लोककथा बहुत मशहूर है। दुल्ला भट्टी मुगल शासकों के समय का एक बहादुर योद्धा था। मुगल शासक एक गरीब ब्राह्मण की दो लड़कियों सुंदरी और मुंदरी के साथ विवाह करना चाहता था, जबकि उनका विवाह पहले से कहीं और तय था। दुल्ला भट्टी ने लड़कियों को मुगल शासक के चंगुल से छुड़वाकर उनकी शादी करवाई। उस समय उसके पास और कुछ नहीं था, इसलिए एक शेर शक्कर उनकी झोली में डाल कर उन्हें विदा किया। दुल्ला भट्टी की कहानी को आज भी पंजाब के लोक-गीतों में सुना जा सकता है।

जी हां, लोहड़ी पर दुल्ला भट्टी की लोककथा बहुत मशहूर है। दुल्ला भट्टी मुगल शासकों के समय का एक बहादुर योद्धा था। मुगल शासक एक गरीब ब्राह्मण की दो लड़कियों सुंदरी और मुंदरी के साथ विवाह करना चाहता था, जबकि उनका विवाह पहले से कहीं और तय था। दुल्ला भट्टी ने लड़कियों को मुगल शासक के चंगुल से छुड़वाकर उनकी शादी करवाई। उस समय उसके पास और कुछ नहीं था, इसलिए एक शेर शक्कर उनकी झोली में डाल कर उन्हें विदा किया। दुल्ला भट्टी की कहानी को आज भी पंजाब के लोक-गीतों में सुना जा सकता है।

लोहड़ी पर कई सारी कहानियां सुनाई जाती है। लोहड़ी का संबंध भगवान कृष्ण से भी है। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान कृष्ण को मारने के लिए कंस ने लोहित नाम की राक्षसी को नंदगांव भेजा था। उस समय लोग मकर संक्रांति के पर्व को मनाने की तैयारियां कर रहे थे। लोहिता श्रीकष्ण को मारने पहुंची तो भगवान ने ही राक्षसी का वध कर दिया। इस वजह से मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी का पर्व मनाया जाने लगा।

लोहड़ी पर कई सारी कहानियां सुनाई जाती है। लोहड़ी का संबंध भगवान कृष्ण से भी है। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान कृष्ण को मारने के लिए कंस ने लोहित नाम की राक्षसी को नंदगांव भेजा था। उस समय लोग मकर संक्रांति के पर्व को मनाने की तैयारियां कर रहे थे। लोहिता श्रीकष्ण को मारने पहुंची तो भगवान ने ही राक्षसी का वध कर दिया। इस वजह से मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी का पर्व मनाया जाने लगा।

इस साल का पहला त्योहार पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। हर्षोल्लास से भरा, जीवन में नई स्फूर्ति, एक नई उर्जा, आपसी भाईचारे को बढ़ाने के लिए लोहड़ी का त्यौहार मनाया जा रहा है। 

इस साल का पहला त्योहार पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। हर्षोल्लास से भरा, जीवन में नई स्फूर्ति, एक नई उर्जा, आपसी भाईचारे को बढ़ाने के लिए लोहड़ी का त्यौहार मनाया जा रहा है। 

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