कहर बरपाने लगी है अकसर बाढ़, बचने के लिए अपनाएं ये देसी उपाय

First Published 13, Aug 2019, 2:46 PM IST

आपने कभी उन बुजुर्गों की बात सुनी है जो आसमान की ओर ताक कर, चिड़िया की आवाज सुन कर या फिर पेड़ पौधों को देख आने वाले मौसम का हाल बता देते थे। वैज्ञानिक अब उनके इस ज्ञान का इस्तेमाल कर मौसम की स्थिती का पूर्वानुमान लगाएंगे। देसी तरीकों को शामिल करने को प्रथमिकता दी जाए। ब्रिटिश एकेडमी ने रिसर्च में बताया ,ऐसे निपटे बाढ़ आपदा से

महाराष्ट्र: देश भर के कई राज्यों में भारी बारिश के चलते जन-जीवन अस्त-वयस्त हो गया है। मानसून ने कर्नाटक और महाराष्ट्र के कई हिस्सों को बुरी तरीके से प्रभावित किया है। चार राज्यों में मौत का कुल आंकड़ा 142 तक पहुंच गया है। महाराष्ट्र में लगभग चार लाख लोगों को रेसक्यू कर बचाया गया। कर्नाटक में बारिश से संबंधित घटनाओं में अबतक 26 लोगों की मौत हो गई। शुक्रवार को आए भूस्खलन के बाद केरल के मलप्पुरम और कवलप्पारा में कीचड़ और मलबे के नीचे लगभग 50 लोगों के फंसने की आशंका है। आकड़ा बढ़ भी सकता है। कोझिकोड और मलप्पुरम जिलों में 20 लोग मारे गए हैं।  8 अगस्त को बाढ़ के चलते वायनाड में नौ लोगों की मौत हो गई है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आबादी लाखों लोगों का जीवन ऐसे मौसम के खतरे में डाल रही है जिसका पहले से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। रिसर्चरों की मानें तो, जलवायु में परिवर्तन को समझने के लिए प्राकृतिक संकेतों को देखना होगा और समझना होगा। इन सबका इस्तेमाल कर शहरों में रहने वालों को मौसम की चरम स्थिति के बारे में आगाह किया जा सकता है। शहरों के लोग अकसर ऐसे पूर्वानुमानों को नहीं मानते हैं। यह बातें ब्रिटिश एकेडमी के जर्नल में छपी एक रिसर्च रिपोर्ट में कही गई है।

महाराष्ट्र: देश भर के कई राज्यों में भारी बारिश के चलते जन-जीवन अस्त-वयस्त हो गया है। मानसून ने कर्नाटक और महाराष्ट्र के कई हिस्सों को बुरी तरीके से प्रभावित किया है। चार राज्यों में मौत का कुल आंकड़ा 142 तक पहुंच गया है। महाराष्ट्र में लगभग चार लाख लोगों को रेसक्यू कर बचाया गया। कर्नाटक में बारिश से संबंधित घटनाओं में अबतक 26 लोगों की मौत हो गई। शुक्रवार को आए भूस्खलन के बाद केरल के मलप्पुरम और कवलप्पारा में कीचड़ और मलबे के नीचे लगभग 50 लोगों के फंसने की आशंका है। आकड़ा बढ़ भी सकता है। कोझिकोड और मलप्पुरम जिलों में 20 लोग मारे गए हैं। 8 अगस्त को बाढ़ के चलते वायनाड में नौ लोगों की मौत हो गई है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आबादी लाखों लोगों का जीवन ऐसे मौसम के खतरे में डाल रही है जिसका पहले से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। रिसर्चरों की मानें तो, जलवायु में परिवर्तन को समझने के लिए प्राकृतिक संकेतों को देखना होगा और समझना होगा। इन सबका इस्तेमाल कर शहरों में रहने वालों को मौसम की चरम स्थिति के बारे में आगाह किया जा सकता है। शहरों के लोग अकसर ऐसे पूर्वानुमानों को नहीं मानते हैं। यह बातें ब्रिटिश एकेडमी के जर्नल में छपी एक रिसर्च रिपोर्ट में कही गई है।

रिसर्च के लिए घाना(अफ्रीका) के 21 ग्रामीण और शहरी इलाके में रहने वाले 1050 लोगों से बात की गई। रिसर्चरों ने ऐसे प्राकृतिक संकेतों की सूची बनाई जिन्हें गांव में बाढ़, सूखा या फिर तापमान में बदलाव का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें बारिश का रूप, चींटियों का व्यवहार, कुछ विशेष चिड़ियों का दिखना, बाओबाब पेड़ में फूल लगना और गर्मी की तीव्रता शामिल हैं। सारे ग्रामीण संकेतों को शहरों तक नहीं पहुंचाया जा सकता लेकिन कुछ ऐसे हैं जो दोनों जगहों के वातावरण के लिए उपयुक्त हैं जैसे कि बादल, गर्मी और पेड़।

रिसर्च के लिए घाना(अफ्रीका) के 21 ग्रामीण और शहरी इलाके में रहने वाले 1050 लोगों से बात की गई। रिसर्चरों ने ऐसे प्राकृतिक संकेतों की सूची बनाई जिन्हें गांव में बाढ़, सूखा या फिर तापमान में बदलाव का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें बारिश का रूप, चींटियों का व्यवहार, कुछ विशेष चिड़ियों का दिखना, बाओबाब पेड़ में फूल लगना और गर्मी की तीव्रता शामिल हैं। सारे ग्रामीण संकेतों को शहरों तक नहीं पहुंचाया जा सकता लेकिन कुछ ऐसे हैं जो दोनों जगहों के वातावरण के लिए उपयुक्त हैं जैसे कि बादल, गर्मी और पेड़।

रिसर्च में एक अनुमान लगाया गया कि 2050 तक 30 लाख से ज्यादा लोग भारी बारिश के कारण बाढ़ के खतरे का सामना कर सकते हैं क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण अप्रत्याशित मौसम के खतरे बढ़ते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन कराने वाले कार्बन को ना रोका गया तो इसके खतरों में बाढ़ और पानी की कमी के साथ ही भारी गर्मी और बिजली का गुल होना भी शामिल है।

रिसर्च में एक अनुमान लगाया गया कि 2050 तक 30 लाख से ज्यादा लोग भारी बारिश के कारण बाढ़ के खतरे का सामना कर सकते हैं क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण अप्रत्याशित मौसम के खतरे बढ़ते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन कराने वाले कार्बन को ना रोका गया तो इसके खतरों में बाढ़ और पानी की कमी के साथ ही भारी गर्मी और बिजली का गुल होना भी शामिल है।

रिसर्चरों का कहना है कि आने वाले सालों में बाढ़ का खतरा ज्यादा से ज्यादा होता जाएगा और इसके बारे में पहले से अनुमान लगाना मुश्किल होता जाएगा। ऐसे में जरूरी है कि देसी तरीकों को शामिल करने को प्रथमिकता दी जाए। तंजानिया, जिम्बावे, म्यांमार और इथियोपिया जैसे देशों में लोग इन तरीकों का इस्तेमाल कर बाढ़ या सूखे की थाह लगा लेते हैं।

रिसर्चरों का कहना है कि आने वाले सालों में बाढ़ का खतरा ज्यादा से ज्यादा होता जाएगा और इसके बारे में पहले से अनुमान लगाना मुश्किल होता जाएगा। ऐसे में जरूरी है कि देसी तरीकों को शामिल करने को प्रथमिकता दी जाए। तंजानिया, जिम्बावे, म्यांमार और इथियोपिया जैसे देशों में लोग इन तरीकों का इस्तेमाल कर बाढ़ या सूखे की थाह लगा लेते हैं।

इन देसी तरीकों को वैज्ञानिक रिसर्च के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके साथ ही रिसर्च में यह भी कहा गया है कि लोगों का जीवन पर्यावरण के कारण होने वाले बदलावों का सबसे ज्यादा नुकसान झेल रहा है।

इन देसी तरीकों को वैज्ञानिक रिसर्च के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके साथ ही रिसर्च में यह भी कहा गया है कि लोगों का जीवन पर्यावरण के कारण होने वाले बदलावों का सबसे ज्यादा नुकसान झेल रहा है।

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