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समाधि में लीन महंत नरेंद्र गिरी: शिष्य बलवीर ने की पूरी क्रिया, 13 अखाड़ों के संत पहुंचे..जानिए महत्व
प्रयागराज ( उत्तर प्रदेश). अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद (akhada parishad) के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी (Mahant Narendra Giri) भू-समाधि दी गई। महंत के पार्थिव देह को समाधि देने से पहले शहर में घुमाते हुए संगम में गंगा में स्नान कराया गया था। इसके बाद देह को बाघंबरी मठ लाया गया है और संत-परंपरा के मुताबिक बाघंबरी मठ के बगीचे में भू-समाधि दी गई। महंत की भू-समाधि में सभी अंतिम क्रिया शिष्य बलबीर गिरि ने करवाईं। संतों के बताए अऩुसार मठ के बगीचे में10-12 फीट का गड्ढा खोदकर देह को शवआसन की मुद्रा में लेटाया गया है।

मंत्रोच्चार के बीच महंत नरेंद्र गिरि के पार्थिव शरीर को भू-समाधि दी गई। इस मौके पर बड़ी संख्या में साधु-संत यहां पर मौजूद थे। हरिद्वार से लेकर अन्य जगरों से अलग-अलग अखाड़ों और मठों के साधु यहां पर पहुंचे। बताया जाता है कि पूरे देश से 13 अखाड़ों के संत आए हुए हैं।
ब्रह्मलीन महंत नरेंद्र गिरि की भू-समाधि में पार्थिव देह रखे जाने से पहले चीनी-नमक डाला गया। इसके बाद चंदन का लेप लगाकर बैठने की मुद्रा में पार्थिव देह रखा गया। इसी बीच दूर-दूर से पहुंचे सांधु-संतों ने मंत्रोचारण करते रहे। महात्माओं से लेकर आम आदमी तक ने महंत के देह पर पुष्प, पैसा, मिट्टी आदि अर्पित प्रणाण किया।
बता दें कि ब्रह्मलीन संतों को समाधि देने की परंपरा सैंकड़ों साल पुरानी है। संतों के शरीर त्याग देने के बाद उनको संत परंपरा अनुसार जल या भू समाधि दी जाती है। माना जाता है कि ब्रह्मलीन होने के बाद संन्यासियों का दाह संस्कार नहीं होता। उन्हें जल व भू-समाधि ही दी जाती है।
जल समाधि देने के लिए पार्थिव शरीर किसी पवित्र नदी की बीच में मंत्रोच्चार पूजा आदि करके विसर्जित किया जाता है। बताया जाता है कि इस दौरान देह के साथ कोई वजनी जीच बांध दी जाती है ताकि शव पानी से ऊपर नहीं आए।
वहीं दूसरी समाधि, भूमि समाधि होती है, जहां जमीन में करीब 5 फीट के आसपास गड्डा खोदा जाता है। इसके बाद पार्थिव शरीर को संतों के बताई मुद्र में रख दिया जाता है। संतों और संन्यासियों के मुताबिक, भू-समाधि इसलिए दी जाती है ताकि उनके अनुयायी अपने गुरू के दर्शन और उऩके समक्ष बैठकर पूजा-ध्यान आदि कर सकें। इसके अलावा साधु-संत जब समाधि लेते हैं तो उनको भगवान के चरणों में जगह मिलती है।
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