भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में तिरंगा झंडा लोगों में भारतीयता का संचार करता था। एक झंडे के नीचे आने पर सभी के अंदर अंग्रेजों से लड़ने का जज्बा पैदा होता था। मगर 115 साल पहले ऐसा नहीं था हमारा झंडा। 

नई दिल्ली. कहा जा सकता है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को धार देने का काम भारतीय तिरंगे झंडे ने ही किया। हालांकि इस झंडे में भी लगातार बदलाव होते रहे हैं। अब से करीब 115 साल पहले यानी 1907 में जब स्वदेशी आंदोलन चल रहा था, तब हमारे झंडे का स्वरूप ऐसा नहीं था, जो आज दिखता है। 1907 में कलकत्ता के पारसी बागान स्क्वायर में जो झंडा फहराया गया था, उसमें हरे, पीले और लाल रंग के तीन क्षैतिज बैंड थे। बीच में सफेद रंग की पट्टी थी, जिस पर देवनागरी भाषा में वंदेमातरम लिखा हुआ था। 8 प्रांतो का प्रतिनिधित्व करने के लिए शीर्ष के हरे रंग पर 8 कमल के फूल उकेरे गए थे। सबसे नीचे की लाल पट्टी पर हिंदुओं के प्रतीक सूर्य का चिह्न और इस्लाम का प्रतीक अर्धचंद्र बना हुआ था।

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पहली बार विदेश धरती पर फहराया झंडा
यह 1907 का ही वक्त रहा जब पहली बार किसी विदेशी देश में भारतीय ध्वज फहराया गया था। जर्मनी के स्टटगार्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन के दौरान प्रमुख भारतीय स्वतंत्रता सेनानी मैडम कामा ने वह झंडा फहराया था। उस वक्त जो झंडा जर्मनी में फहराया गया उसमें 8 के बजाय केवल 1 ही कमल था। साथ ही इसमें सप्तर्षि नक्षत्र को दर्शाने वाले सात तारे भी थे।

1917 में फिर हुआ झंडे में बदलाव
1917 हमारे झंडे की यात्रा का अगला वर्ष था। तब एनी बेसेंट और तिलक ने होमरूल आंदोलन के हिस्से के रूप में वह झंडा फहराया। लेकिन आंदोलन का उद्देश्य भारत के लिए पूर्ण स्वराज नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर एक स्वायत्त क्षेत्र की स्थिति के लिए थी। इसलिए इस ध्वज में ब्रिटिश यूनियन जैक भी था। यह लाल और हरे रंग यानि हिंदू और मुस्लिम समुदायों का प्रतिनिधित्व करता था। इसमें 7 सितारों के रूपांकनों और एक अर्धचंद्र भी शामिल था।

1921 में कांग्रेस ने फहराया झंडा
कांग्रेस ने पहली बार 1921 में झंडा अपनाया। तब युवा स्वतंत्रता सेनानी पिंकली वेंकैया द्वारा गांधीजी को एक डिजाइन प्रस्तुत किया गया था। इसमें कांग्रेस का प्रतीक चरखा था, जो हिंदुओं और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले लाल और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों पर लगाया गया था। गांधीजी ने अन्य सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक सफेद पट्टी को भी शामिल करने का सुझाव दिया। 1931 में कुछ संशोधनों के साथ वेंकैया के डिजाइन को अपनाया गया। लाल को केसरिया रंग में बदल दिया गया। कांग्रेस ने घोषणा की थी कि रंग धार्मिक समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। कहा कि भगवा साहस के लिए, सफेद शांति के लिए और हरा रंग उर्वरता के लिए शामिल किया गया है। चरखा हमारी सतत प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है। बाद में संविधान सभा ने इसे स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। जिसमें सम्राट अशोक के धर्मचक्र ने चरखे की जगह ले ली। 

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