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जानिए : अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद HC 2010 के फैसले को क्यों किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए निर्णय में जजों की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 के फैसले को रद्द कर दिया है। शीर्ष कोर्ट ने 2010 के निर्णय में पाया कि हिंदू और मुस्लिम विवादित भूमि पर एक साथ कब्जे में थे। जिसके कारण विवादित स्थल का तीन-तरफा विभाजन किया गया, जो सामाजिक शांति के लिए सही नहीं थे। 

Explained: Why Supreme Court rejected the Allahabad HC judgment on Ayodhya dispute
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New Delhi, First Published Nov 9, 2019, 7:14 PM IST
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नई दिल्ली. अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए निर्णय में जजों की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 के फैसले को रद्द कर दिया है। जिसमें कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के निर्णय में पाया कि हिंदू और मुस्लिम विवादित भूमि पर एक साथ कब्जे में थे, जिसके कारण विवादित स्थल का तीन-तरफा विभाजन किया गया। इसमें एक तिहाई हिस्सा मुसलमानों, हिंदुओं और निर्मोही अखाड़े को सौंपा गया था। जस्टिस एस यू खान ने माना था कि विवाद में तीनों का अधिकार है और इसलिए विवादित स्थल को तीनों पक्षों के बीच समान रूप से बांटा जाना चाहिए। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि पूर्ण न्याय करने के लिए और तमाम दावेदारों का निराकरण करने व इसमें संशोधन करने के लिए इस मामले को खोला गया था, जिसमें इसका तीन हिस्सों में बंटवारा किया गया। 

इन कारणों से इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को रद्द किया गया 

1. उपासक द्वारा पूजा करने के अधिकार देने की मांग करने वाला एक पक्षकार।
2. निर्मोही अखाड़ा द्वारा एक मुकदमे में मंदिर के प्रबंधन और प्रभार के लिए अधिकार प्राप्त करने का दावा किया गया।
3. सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और मुसलमानों द्वारा टाइटल पर एक घोषणात्मक सूट।
 

कोर्ट की टिप्पणी 

श्रीनिवास राम कुमार बनाम महाबीर प्रसाद के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि किसी मामले में वादी को राहत देने के लिए अदालत नहीं खोला गया है, जिसके वादों में कोई आधार नहीं है। इसने श्री वेंकटरामण देवरू बनाम मैसूर राज्य के इस सिद्धांत को दोहराया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है, "उच्च न्यायालय द्वारा एक रास्ता अपनाया गया, जो इसके लिए खुला नहीं था ... ने राहत दी, जो सूट में प्रार्थनाओं का विषय नहीं था"। 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा उच्च न्यायालय ने राहत देने में पूरी तरह से गलती की जो वादों के दायरे से बाहर है और वादियों द्वारा मुकदमा 3, 4 और 5 में स्थापित किए गए हैं। 

कोर्ट ने सूट को सीमित कर रोक दिया था 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवादित स्थल के तीन-तरफा विभाजन के आदेश में उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण में "एक और गंभीर दोष" है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सूट 3 जो निर्मोही अखाड़ा द्वारा दायर किया गया और सूट 4 जो सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा दायर किया को सीमित करके रोक दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया है कि उच्च न्यायालय ने सूट 5 को सूट 3 और 4 में वादकारियों को राहत देने के लिए यह कार्यवाही की।  कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का यह निर्णय तर्क को धता बताता है और कानून के बसे सिद्धांतों के विपरीत है"।

निर्णय शांति बनाए रखने की दिशा में नहीं थे

इसके बाद कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 के फैसले को रद्द कर दिया है।  कोर्ट ने टिप्पणी की कि “सार्वजनिक शांति बनाए रखने के मामले में भी, जो समाधान उच्च न्यायालय ने सुनाया है वह संभव नहीं है। विवादित स्थल सभी 1,500 वर्ग गज में फैला हुआ है। भूमि को विभाजित करने से दोनों पक्षों के हितों का संरक्षण नहीं होगा। साथ ही शांति और शांति की स्थायी भावना सुरक्षित नहीं रहेगी। ”

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