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जब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को लगाई थी फटकार, कहा था- आपकी एक गलती और हार जाएंगे पांडव

भगवान कृष्ण और अर्जुन-युधिष्ठिर के किस्सों से मिलता है लाइफ मैनेजमेंट का अहम सबक

One should not make any impossible promise without thinking or else one regrets after that
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Ujjain, First Published Aug 21, 2019, 6:56 PM IST
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उज्जैन. जन्माष्टमी (23 अगस्त, शुक्रवार) के अवसर पर हम आपको बता रहे हैं महाभारत के 2 किस्से, जिनमें श्रीकृष्ण ने लाइफ मैनेजमेंट के महत्वपूर्ण सूत्र बताएं हैं। ये आपके जीवन में भी प्रासंगिक हैं।

किस्सा 1: द्वारिका में भगवान कृष्ण की राजसभा का नाम था सुधर्मा सभा। एक दिन सुधर्मा सभा में भगवान कृष्ण के साथ अर्जुन भी बैठे हुए थे। तभी एक ब्राह्मण आकर भगवान कृष्ण को उलाहने देने लगा। ब्राह्मण के घर जब भी कोई संतान होती, वो पैदा होते ही मर जाती थी। ब्राह्मण ने कृष्ण पर आरोप लगाया कि तुम्हारे छल-कपट भरे कामों के कारण द्वारिका में नवजात बच्चों की मौत हो जाती है। भगवान कृष्ण चुप रहे। ब्राह्मण लगातार भगवान पर आरोप लगाता रहा। यह देख रहे अर्जुन से रहा नहीं गया।

उसने ब्राह्मण से कहा कि वो भगवान पर आरोप लगाना बंद करे। वो उसके पुत्र की रक्षा करेगा। कृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि ये सब नियति का खेल है, इसमें हस्तक्षेप न करे, लेकिन अर्जुन ने भगवान कृष्ण की बात नहीं मानी और उसने ब्राह्मण को वचन दे दिया कि वो उसके बच्चों को यमराज से बचाएगा। अगर नहीं बचा पाया तो वो खुद भी प्राण त्याग कर देगा। ब्राह्मण लौट गया। जब उसकी पत्नी को बच्चा होने वाला था, ब्राह्मण अर्जुन के पास पहुंचा। अर्जुन ने ब्राह्मण के घर की घेराबंदी कर दी, लेकिन जैसे ही बच्चे ने जन्म लिया, यमदूत नवजात बच्चे के प्राण को लेकर चले गए। 

अर्जुन बालक के प्राण बचा नहीं सका। ब्राह्मण उसे धिक्कारने लगा। अर्जुन बालक के प्राणों के लेने के लिए यमपुरी तक गया, लेकिन बालक को नहीं बचा सका। वचन का पालन करने के लिए अर्जुन ने अपने प्राण त्यागने का प्रण किया। ये बात भगवान को पता लगी। वे अर्जुन के पास पहुंचे। अर्जुन प्राण त्यागने के लिए तैयार था। भगवान ने उसे समझाया। वे अर्जुन को लेकर अपने धाम गए। वहां पर अर्जुन ने देखा कि ब्राह्मण के सारे बच्चे भगवान की शरण में हैं। भगवान ने अर्जुन को समझाया कि कभी बिना सोचे-समझे किसी को कोई वचन नहीं देना चाहिए। फिर भगवान ने अर्जुन को बचाने के लिए ब्राह्मण पुत्रों के प्राण यमराज से लौटा लिए।

लाइफ मैनेजमेंट: हमें अपने ऊपर कितना भी आत्मविश्वास हो, लेकिन फिर भी असंभव-सा वादा नहीं करना चाहिए।

किस्सा 2: महाभारत युद्ध का आखिरी दिन था। दुर्योधन कुरुक्षेत्र स्थित तालाब में जाकर छुप गया। सारी कौरव सेना समाप्त हो चुकी थी। दुर्योधन के अलावा कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा ही कौरव सेना में शेष बचे थे। पांडव दुर्योधन को खोजते हुए उस तालाब के किनारे पहुंचे। तालाब में छिपे दुर्योधन से युधिष्ठिर ने बात की। दुर्योधन ने कहा कि तुम पांच भाई हो और मैं अकेला हूं। हममें युद्ध कैसे हो सकता है? तो युधिष्ठिर ने दुर्योधन से कहा कि हम पांचों तुम्हारे साथ नहीं लड़ेंगे। तुम हममें से किसी एक को युद्ध के लिए चुन लो। अगर तुमने उसे हरा दिया तो हम तुम्हें युद्ध में जीता मानकर राज्य तुम्हें सौंप देंगे।

युधिष्ठिर की बात सुन श्रीकृष्ण को क्रोध आ गया। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि तुमने ये क्या किया? इतने भीषण युद्ध के बाद हाथ आई जीत को हार में बदल लिया। ये युद्ध है, इसमें जुए का नियम मत लगाओ। अगर दुर्योधन ने नकुल, सहदेव में से किसी एक को युद्ध के लिए चुन लिया तो वे प्राणों से भी जाएंगे और हमारे हाथ से वो राज्य भी चला जाएगा।

लाइफ मैनेजमेंट: आपको किसी भी वादे को करने से पहले उस पर ठीक से विचार तो करना चाहिए। ऐसे बिना सोचे-समझे ही अपना सबकुछ दांव पर कैसे लगाया जा सकता है।

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