किसी देवता या राक्षस ने नहीं बल्कि एक ऋषि ने राजा पर चलाया था पहली बार ब्रह्मास्त्र, क्या हुआ इसके बाद?

Published : Jun 17, 2022, 04:55 PM IST
किसी देवता या राक्षस ने नहीं बल्कि एक ऋषि ने राजा पर चलाया था पहली बार ब्रह्मास्त्र, क्या हुआ इसके बाद?

सार

हिंदू धर्म ग्रंथों में अनेक दिव्यास्त्रों के बारे में बताया गया है। इन सभी में ब्रह्मास्त्र को सबसे विनाशकारी अस्त्र माना गया है। ब्रह्मास्त्र की रचना स्वयं ब्रह्मदेव ने दुष्टों के नाश के लिए की थी।  

उज्जैन. कहा जाता है कि ब्रह्मास्त्र में कई परमाणु बम के बराबर की शक्ति थी। महाभारत और रामायण में कई मौकों पर इस अस्त्र का उपयोग हुआ था। Asianetnews Hindi ब्रह्मास्त्र (Brahmastra Series 2022) पर एक सीरीज चला रहा है, कहानी ब्रह्मास्त्र की…जिसमें हम आपको ब्रह्मास्त्र से जुड़ी खास बातें, प्रसंग व अन्य रोचक तथ्यों के बारे में बताएंगे। आज हम आपको ब्रह्मास्त्र से जुड़ा एक ऐसा ही प्रसंग बता रहे हैं, जो बहुत ही रोचक है। इस प्रसंग में हम आपको बताएंगे कि सबसे पहले किसी देवता या राक्षस ने नहीं बल्कि एक ऋषि ने राजा पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। आगे जानिए कौन थे वो ऋषि…

जब राजा विश्वामित्र भटक गए रास्ता
प्राचीन काल में गाधी नाम के एक राजा थे। उनके पुत्र का नाम विश्वामित्र (King Vishwamitra) था। वे अपने प्रजा को हर प्रकार से प्रसन्न रखते थे और उनके सुख-दुख का ध्यान रखते थे। एक बार राजा विश्वामित्र अपनी सेना के साथ शिकार करने लगे और रास्ता भटक गए। राजा सहित पूरी सेना भूख-प्यास से व्याकुल हो गई। तभी सामने एक आश्रम दिखाई दिया। वो आश्रम महर्षि वशिष्ठ (Rishi Vashishta) का था, जो रघुवंश के कुलगुरु थे। राजा विश्वामित्र को सेना सहित आता देख महर्षि वशिष्ठ ने उनका उचित आदर सत्कार किया।

जब राजा विश्वामित्र को पता चला ये रहस्य
जब महर्षि वशिष्ठ को पता चला कि राजा सहित पूरी सेना भूख-प्यास से व्याकुल है तो उन्होंने तुरंत उनके खाने-पीने का प्रबंध किया। इतनी जल्दी पूरी सेना के लिए भोजन का प्रबंध हो जाने पर राजा विश्वामित्र ने इसका रहस्य पूछा तो महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें बताया कि “हे राजन, मेरे पास नंदिनी नामक एक गाय जो स्वर्ग की कामधेनु गाय की संतान हैं। ये गाय मुझे स्वयं इंद्रदेव ने भेंट में दी थी। नंदिनी गाय से जो भी मांगों, वह तुरंत मुझे प्रदान करे देती है।

जब विश्वामित्र हार गए ऋषि वशिष्ठ से
महर्षि वशिष्ठ की बात सुनकर राजा विश्वामित्र ने कहा कि “हे गुरुवर, आप मुझे ये नंदिनी गाय दे दीजिए, बदले में जितना भी धन चाहिए, वो ले लीजिए”
राजा की बात सुनकर महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि “ ये नंदिनी गाय मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है, इसलिए मैं इसे किसी को भी नहीं दे सकता।”
राजा विश्वामित्र को लगा कि ऋषि वशिष्ठ मेरा अपमान कर रहे हैं, ये सोचकर उन्होंने अपनी सेना को नंदिनी गाय को अपने साथ बलपूर्वक लेकर जाने का आदेश दिया। जैसे ही सैनिकों ने नंदिनी गाय को पकड़ा और अपने साथ ले जाने तो तो गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से नंदिनी ने भयंकर रूप धारण कर पूरी सेना का विध्वंस कर दिया। महर्षि वशिष्ठ ने क्रोधित होकर राजा विश्वामित्र के एक पुत्र को छोड़ सभी को शाप से भस्म कर दिया। 

जब महर्षि वशिष्ठ ने चलाया ब्रह्मास्त्र
अपने पुत्रों की मृत्यु और हार का बदला लेने के लिए राजा विश्वामित्र ने घोर तपस्या की और भगवान शिव के दिव्यास्त्र प्राप्त पुन: महर्षि वशिष्ठ से युद्ध करने पहुंचें। मगर राजा विश्वामित्र के हर अस्त्र-शस्त्र ने महर्षि वशिष्ठ ने अपने ब्रह्मतेज से नष्ट कर दिया। अंत में क्रोधित होकर महर्षि वशिष्ठ ने राजा विश्वामित्र पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। ऐसा करने से तीव्र ज्वाला उठने लगी, प्राणियों में हाहाकार मच गया। तब देवताओं ने आकर महर्षि वशिष्ठ ने ब्रह्रास्त्र वापस लेने का अनुरोध किया। सृष्टि के कल्याण के लिए महर्षि वशिष्ठ ने ऐसा ही किया। इस तरह एक ऋषि ने राजा पर पहली बार ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था।

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