नवजात शिशुओं को लंबी उम्र और बेहतर स्वास्थ्य प्रदान करती हैं षष्ठी देवी, छठ व्रत पर करते हैं इनकी भी पूजा

Published : Oct 31, 2019, 09:00 AM IST
नवजात शिशुओं को लंबी उम्र और बेहतर स्वास्थ्य प्रदान करती हैं षष्ठी देवी, छठ व्रत पर करते हैं इनकी भी पूजा

सार

धर्म शास्त्रों के अनुसार, षष्ठी देवी प्रमुख मातृ शक्तियों का ही अंश स्वरूप है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखण्ड के अनुसार, परमात्मा ने सृष्टि की रचना के लिए स्वयं के शरीर को दो भागों में विभक्त कर लिया।

उज्जैन. दक्षिण भाग से पुरुष तथा वाम भाग से स्त्री (प्रकृति) का जन्म हुआ। यहां प्रकृति शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गई है- प्र अर्थात सत्वगुण, कृ अर्थात रजोगुण व ति अर्थात तमोगुण।

त्रिगुणात्मस्वरूपा या सर्वशक्तिसमन्विता।
प्रधानसृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते।।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखंड 1/6)

उपर्युक्त पुराण के अनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री ये ही प्रकृतिदेवी स्वयं को पांच भागों में विभक्त करती है- दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री। ये पांच देवियां पूर्णतम प्रकृति कहलाती हैं।
मार्कण्डेयपुराण के अनुसार- स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु। प्रकृति के एक प्रधान अंश को देवसेना कहते हैं जो सबसे श्रेष्ठ मातृका मानी जाती है। ये समस्त लोकों के बालकों की रक्षिका देवी हैं। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी को ही षष्ठी देवी कहा गया है।

षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता।
बालकाधिष्ठातृदेवी विष्णुमाया च बालदा।।
आयु:प्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी।
सततं शिशुपाश्र्वस्था योगेन सिद्धियोगिनी।।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड 43/4/6)

यह षष्ठी देवी नवजात शिशुओं की रक्षा करती हैं तथा उन्हें आरोग्य व दीर्घायु प्रदान करती हैं। इन षष्ठी देवी का पूजन ही कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को किया जाता है।

छठ मैया ने किया था चमत्कार
श्रीमद्देवी भागवत पुराण के अनुसार- स्वायम्भुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत को अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई। तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी को चरू (प्रसाद) दिया, जिससे गर्भ तो ठहर गया, किंतु मृत पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रियवत उस मृत बालक को लेकर श्मशान गए। पुत्र वियोग में प्रियवत ने भी प्राण त्यागने का प्रयास किया। ठीक उसी समय मणि के समान विमान पर षष्ठी देवी वहां आ पहुंची। मृत बालक को भूमि पर रखकर राजा ने उस देवी को प्रणाम किया और पूछा- हे सुव्रते! आप कौन हैं?
देवी ने आगे कहा- तुम मेरा पूजन करो और अन्य लोगों से भी कराओ। इस प्रकार कहकर देवी षष्ठी ने उस बालक को उठा लिया और खेल-खेल में उस बालक को जीवित कर दिया। राजा ने उसी दिन घर जाकर बड़े उत्साह से नियमानुसार षष्ठी देवी की पूजा संपन्न की। चूंकि यह पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को की गई थी, अत: इस विधि को षष्ठी देवी/छठ देवी का व्रत होने लगा।

सीता व द्रौपदी ने भी की थी छठ पूजा
मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम के वनवास से लौटने पर राम और सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन उपवास रखकर भगवान सूर्य की आराधना की और सप्तमी के दिन व्रत पूर्ण किया। पवित्र सरयू के तट पर राम-सीता के इस अनुष्ठान से प्रसन्न होकर भगवान सूर्यदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया था।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, जब पांडव अपना सारा राजपाट जुएं में हारकर जंगल-जंगल भटक रहे थे, तब इस दुर्दशा से छुटकारा पाने के लिए द्रौपदी ने सूर्यदेव की आराधना के लिए छठ व्रत किया। इस व्रत को करने के बाद पांडवों को अपना खोया हुआ वैभव पुन: प्राप्त हो गया था।
 

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