बिहार के इस मंदिर में छठपूजा व्रत करने से पूरी होती हैं मनोकामनाएं, अयोध्या से जुड़ा है बेहद पुराना इतिहास

Published : Oct 25, 2022, 11:19 AM IST
बिहार के इस मंदिर में छठपूजा व्रत करने से पूरी होती हैं मनोकामनाएं, अयोध्या से जुड़ा है बेहद पुराना इतिहास

सार

छठपूजा को लेकर जहानाबाद के विष्णु मंदिर का प्राचीन इतिहास और उसकी मान्यता अद्भुत है। सूर्योपासना के इस विख्यात केन्द्र में प्रतिवर्ष दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु छठ व्रत के लिए पहुंचते हैं।

जहानाबाद(Bihar). बिहार का छठ महापर्व पूरे विश्व में प्रसिद्द है। यहां महिलाओं द्वारा किया जाने वाला छठ पूजा व्रत सूबे के लिए एक बड़े त्यौहार जैसा ही है। दीवाली के जश्न के बाद आने वाले 28 अक्टूबर से ये महापर्व शुरू हो जाएगा। छठपूजा को लेकर जहानाबाद के विष्णु मंदिर का प्राचीन इतिहास और उसकी मान्यता अद्भुत है। सूर्योपासना के इस विख्यात केन्द्र में प्रतिवर्ष दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु छठ व्रत के लिए पहुंचते हैं। जिले में छठ पूजा का यह एक मुख्य केन्द्र है। इस मंदिर का इतिहास बेहद पुराना और रामायण काल से जुड़ा है।

बिहार के जहानाबाद जिले के काको प्रखंड मुख्यालय स्थित काको विष्णु मंदिर का बेहद प्राचीन इतिहास है। मान्यता है कि काको पनिहास के किनारे विष्णु मंदिर में छठव्रत करने पर लोगों की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यहां विष्णु भगवान की एक बहुत पुरानी मूर्ति स्थापित है। प्रत्येक रविवार को बड़ी संख्या में लोग पूजा करने के लिए आते हैं। मान्यता है कि पनिहास तालाब में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती है। 

रामायण काल से जुड़ा है मंदिर का इतिहास 
इतिहास के मुताबिक प्राचीन काल में पनिहास नदी के दक्षिणी पूर्वी कोने पर राजा ककोत्स का किला था। मान्यता है कि उनकी बेटी केकैयी पनिहास में स्नान करने के उपरांत इसी मंदिर में प्रतिदिन पूजा अर्चना करती थीं। उसी समय से इस मंदिर का इतिहास चला आ रहा है। राजा ककोत्स की बेटी से ही बाद में राजा अयोध्या के राजा दशरथ की विवाह हुआ था। भरत कैकेयी के ही पुत्र थे। रामायण काल से जुड़े होने के कारण इस मंदिर का खासा महत्व है।

खुदाई में मिली थी भगवान विष्णु की मूर्ति 
बताया जाता है कि तकरीबन 1300 ई. के समय काको नाम का एक तालाब था, जहां से बोध गया जाने का सुगम मार्ग था। प्राचीन समय में लोग एक जगह से दूसरे जगह जाने के लिए नदियों के किनारों का और उनसे संबंधित नहरों के किनारे से आवागमन करते थे। इस तालाब में पानी फल्गु नदी से भी आती थी तो लोग इस रास्ते का प्रयोग बोधगया जाने के लिए भी करते थे। 88 एकड़ में फैले इस पनिहास की जब सन् 1948 में खुदाई कराई जा रही थी तो भगवान विष्णु की प्राचीन प्रतिमा मिली थी। उस प्रतिमा को प्राण प्रतिष्ठा के उपरांत पनिहास के उत्तरी-पूर्वी कोने पर स्थापित किया गया था। 1950 में आपसी सहयोग से  भगवान विष्णु का पंचमुखी मंदिर का निर्माण कराया गया जो आज अस्था का केन्द्र बना हुआ है। इस मंदिर के चारों कोने पर भगवान भाष्कर, बजरंग बली, शंकर पार्वती एवं मां दुर्गे की प्रतिमा स्थापित है। 

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