
मुंबई। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और (राष्ट्रीय नागरिक पंजी) NRC को लेकर देशभर में विरोध जारी है। आम लोगों के साथ ही बॉलीवुड के कई बड़े स्टार्स भी नागरिकता कानून के विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं। इनमें फरहान अख्तर, स्वरा भास्कर, जावेद जाफरी से लेकर 'रंग दे बसंती' के डायरेक्टर ओमप्रकाश मेहरा तक शामिल हैं। हालांकि ये सभी विरोध के नाम पर प्रदर्शन तो कर रहे हैं लेकिन असल में नागरिकता कानून है क्या? इसके बारे में किसी को पता तक नहीं है। वैसे भी लोकतंत्र में विरोध तो जायज है, लेकिन उसका कोई आधार जरूर होना चाहिए।
फरहान ने नागरिकता कानून पर दिया गोलमोल जवाब :
19 दिसंबर को मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में बॉलीवुड के कई नामचीन स्टार नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन करते नजर आए। जब इस कानून को लेकर फरहान अख्तर से पूछा गया तो उन्होंने भी गोलमोल जवाब दिया। फरहान ने कहा- अगर आप कानून की डिटेल्स देखें तो उसमें ऐसा लगता है कि हो सकता है कुछ। अगर आप उसे पढ़ेंगे तो ऐसी संभावना है कि कुछ गलत हो सकता है। अगर कानून में कुछ गलत नहीं है तो फिर इतने सारे लोग इकट्ठा क्यों हुए हैं। मुंबई ही नहीं, देश के दूसरे हिस्सों असम, बंगाल, कर्नाटक, दिल्ली, हैदराबाद में प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?
ओमप्रकाश मेहरा बोले, मैं बोलने लायक नहीं :
वहीं, जब इस कानून के बारे में एक और सेलेब्रिटी ओमप्रकाश मेहरा से पूछा गया तो उनका जवाब था- इसके बारे में अभी शायद मैं बोलने लायक नहीं हूं। न तो मैंने बिल को पढ़ा है न समझा है। अब जबकि जानी-मानी हस्तियों का ये हाल है तो फिर देश की भोली-भाली जनता से क्या उम्मीद की जा सकती है। वैसे, विरोध के नाम पर प्रदर्शन करने वाले इन सेलेब्स को देखकर तो यही लगता है कि विरोध का यह मंच उनके लिए सिर्फ एक रंगमंच है।
क्या है नागरिकता संशोधन कानून :
इस कानून में तीन पड़ोसी देशों अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए गैर-मुस्लिम प्रवासियों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है। इन देशों में हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के लोग अल्पसंख्यक हैं और यहां इनका लगातार उत्पीड़न हो रहा है।ऐसे में भारत में 5 साल पूरा कर चुके इन शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी। पहले भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए 11 साल की शर्त थी।
क्यों हो रहा है विरोध :
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध की दो बड़ी वजहें हैं। पहला, उत्तरपूर्व के लोग अपने यहां इस काननू को लागू करने के खिलाफ हैं। उन्हें लगता है कि इस कानून की वजह से उनके यहां शरणार्थियों की संख्या बढ़ जाएगी, जिससे उन्हें भारी नुकसान होगा। इसके अलावा असम के लोगों को डर है कि इससे उनकी असमिया भाषा की वैल्यू कम हो जाएगी और उनकी संस्कृति पर भी खराब असर पड़ेगा।
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