
Economic Survey 2026: इन दिनों दो चीजें सबसे ज्यादा चर्चा में है, इकोनॉमिक सर्वे और बजट। केंद्र सरकार आज 29 जनवरी को इकोनॉमिक सर्वे पेश करने जा रही है और दो दिन बाद 1 फरवरी को देश का बजट आएगा। इसे लेकर एक्सपर्ट्स कई बातें कर रहे हैं, लेकिन आम आदमी यही सोच रहा है कि आखिर दोनों में फर्क क्या है? इकोनॉमिक सर्वे और बजट से उसे क्या फायदा होने वाला है, उसकी जेब पर किसका असर ज्यादा पड़ेगा? अगर आप भी यही सोच रहे हैं, तो ये आर्टिकल आपके लिए है। आइए बिना भारी-भरकम शब्द के बिल्कुल आसान भाषा में इन दोनों को समझते हैं...
इकोनॉमिक सर्वे को आप देश का सालाना रिपोर्ट कार्ड समझ सकते हैं। जैसे स्कूल में रिजल्ट आता है, वैसे ही इसमें सरकार पूरे साल की आर्थिक हालत का हिसाब देती है। इसमें बताया जाता है कि महंगाई कितनी बढ़ी, आम लोगों की खरीदने की ताकत कैसी रही, खेती-किसानी ने कैसा प्रदर्शन किया और नौकरियों की स्थिति में कोई सुधार हुआ या नहीं। ये रिपोर्ट पीछे मुड़कर देखती है। यानी बीते एक साल में क्या अच्छा हुआ और कहां दिक्कतें रहीं, उसकी पूरी तस्वीर सामने रखती है। इसमें सुझाव भी होते हैं कि आगे किन बातों पर ध्यान देने की जरूरत है।
इकोनॉमिक सर्वे सरकार का कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं होता है। इसे हर साल वित्त मंत्रालय की इकोनॉमिक डिवीजन तैयार करती है। इस पूरी प्रक्रिया की अगुवाई चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर करते हैं। अभी यह जिम्मेदारी डॉ. वी अनंत नागेश्वरन के पास है। सरल भाषा में कहें तो यही टीम सरकार को बताती है कि देश की आर्थिक सेहत कैसी है और कहां इलाज की जरूरत है।
बजट का इंतजार हर आम आदमी को रहता है। बजट में सरकार आने वाले साल का पूरा खर्च और कमाई का प्लान बताती है। यहीं तय होता है कि टैक्स में राहत मिलेगी या नहीं, पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा या महंगा, किसानों, नौकरीपेशा लोगों और मिडिल क्लास को क्या मिलेगा। अगर इकोनॉमिक सर्वे रिपोर्ट कार्ड है, तो बजट उस रिपोर्ट के आधार पर लिया गया एक्शन प्लान है। बजट सीधे आपकी जेब से जुड़ा होता है, इसलिए इसका असर तुरंत महसूस होता है।
इकोनॉमिक सर्वे बताता है कि देश की हालत क्या है, जबकि बजट तय करता है कि अब आगे क्या किया जाएगा। इकोनॉमिक सर्वे सलाह देता है, आदेश नहीं। बजट फैसले लेता है और उन्हें लागू भी करता है। एक पीछे की कहानी है, दूसरा आगे की तैयारी।
भले ही सरकार पर इकोनॉमिक सर्वे की हर बात मानने की मजबूरी नहीं होती, लेकिन सच यही है कि बजट की सोच इसी से निकलती है। अगर सर्वे में बताया गया है कि महंगाई ज्यादा है और लोगों पर खर्च का दबाव बढ़ रहा है, तो बजट में राहत की उम्मीद बढ़ जाती है। इसलिए इकोनॉमिक सर्वे को बजट का ट्रेलर भी कहा जाता है। इससे अंदाजा लग जाता है कि सरकार किस दिशा में सोच रही है।
एक्सपर्ट्स के अनुसार, आपकी जेब पर असर बजट का पड़ता है। टैक्स, गैस सिलेंडर, पेट्रोल-डीजल, सैलरी और सेविंग सब कुछ बजट से जुड़ा होता है। इकोनॉमिक सर्वे का असर थोड़ा इनडायरेक्ट होता है। यह बजट की नींव तैयार करता है। यानी सर्वे सोच बनाता है और बजट खर्च तय करता है।
नहीं, सरकार कानूनी तौर पर इकोनॉमिक सर्वे की सिफारिशें मानने के लिए बाध्य नहीं होती है। लेकिन ज्यादातर मामलों में बजट उन्हीं आंकड़ों और सुझावों के आसपास घूमता है। इसलिए सर्वे को नजरअंदाज करना आसान नहीं होता।
भारत में पहला इकोनॉमिक सर्वे साल 1951 में पेश किया गया था। शुरुआती दौर में यह बजट का ही हिस्सा हुआ करता था। बाद में 1964 के बाद इसे बजट से अलग कर दिया गया। तब से यह हर साल बजट से ठीक एक दिन पहले संसद में पेश किया जाता है।
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