
India-EU Deal US China Tension: 18 साल तक अटकी रही भारत-यूरोपियन यूनियन (EU) की फ्री ट्रेड डील आखिरकार साइन हो गई। ऊपर से देखने में यह एक ट्रेड एग्रीमेंट लगता है, लेकिन असल में यह दुनिया की पावर पॉलिटिक्स को हिला देने वाला मूव है। क्योंकि भारत और EU मिलकर ग्लोबल GDP का करीब 25% और दुनिया के कुल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा संभालते हैं। यही वजह है कि इस डील ने सिर्फ बिजनेस नहीं बदला, बल्कि अमेरिका और चीन दोनों को बेचैन कर देने वाला है, खासकर तब जब डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ एक्शन चल रहा है।
भारत दुनिया की चौथी और EU दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इन दोनों का एक साथ आना सीधा-सीधा संदेश देता है कि अब ग्लोबल ट्रेड सिर्फ अमेरिका-चीन के इर्द-गिर्द नहीं घूमने वाला। ये डील एक नई आर्थिक धुरी (New Power Axis) बना रही है, जिसमें भारत केंद्र में है।
एक्सपर्ट्स के अनुसार, अब तक अमेरिका का रोल रूल मेकर (Rule maker) का था, लेकिन भारत-EU डील के बाद यूरोप का झुकाव एशिया में भारत की तरफ बढ़ा है। इससे टेक्नोलॉजी, रेयर मिनरल्स और सप्लाई चेन में अमेरिका की पकड़ कमजोर हो सकती है। चूंकि भारत अब सिर्फ मार्केट नहीं, बल्कि रणनीतिक पार्टनर बनकर उभरा है यानी अमेरिका के लिए यह सॉफ्ट पावर लॉस है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन की असली चिंता ये है कि इस तरह की डील से EU की निर्भरता चीन पर कम हो सकती है और भारत को 'China+1 Strategy' का सबसे बड़ा फायदा मिलने वाला है, मतलब मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन भारत की ओर शिफ्ट हो सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस डील को लेकर कहा कि 'दुनिया में ट्रेड और टेक्नोलॉजी को हथियार बनाया जा रहा है।' भारत-EU डील का मकसद सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाना, किसी एक देश पर निर्भरता कम करना, टेक, एनर्जी और रेयर मिनरल्स में साझेदारी बढ़ाना है। यही वजह है कि यह समझौता सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा रणनीति भी है।
इस डील से भारत को एक्सपोर्ट में 33 अरब डॉलर का बूस्ट मिलेगा। कपड़ा, चमड़ा, ज्वेलरी, मछली जैसे सेक्टर्स को फायदा होगा। IT और प्रोफेशनल सर्विसेज को EU का बड़ा बाजार मिलेगा और डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन सर्विसेज को बढ़ावा मिलेगा। यानी भारत सिर्फ सामान नहीं बेचेगा, सेवाएं और टेक्नोलॉजी भी एक्सपोर्ट करेगा।
इस डील में भारत ने दूध, अनाज, फल और सब्जी जैसी चीजों को FTA से बाहर रखा है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि इसका कारण साफ है कि किसानों को यूरोपियन सस्ते प्रोडक्ट्स से नुकसान न हो। यानी यह डील 'खुला बाजार' नहीं, बल्कि संतुलित रणनीति है।
EU प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा, 'यह डील साबित करती है कि आज की चुनौतियों का जवाब सहयोग है, अलगाव नहीं।' मतलब साफ है कि भारत अब सिर्फ उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि ग्लोबल डिसीजन-मेकर बन रहा है।
भारत और यूरोपियन यूनियन का टारगेट 2032 तक भारत-EU ट्रेड को दोगुना करना है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर ऐसा हुआ, तो ग्लोबल ट्रेड की दिशा बदलेगी। अमेरिका-चीन की मोनोपॉली कमजोर होगी और भारत एक नई आर्थिक सुपरपावर की तरह उभरेगा।
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