बीमा कंपनियों की मनमानी से हिलता भरोसा: कैशलेस इलाज ठप, प्रीमियम बढ़ा पर क्लेम अटका

Published : Oct 08, 2025, 01:13 PM IST
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सार

बीमा कंपनियों और अस्पतालों के बीच दरों को लेकर बढ़ते विवाद से मरीजों की मुश्किलें बढ़ीं। कैशलेस इलाज कई जगह रुका, क्लेम रिजेक्शन की शिकायतें बढ़ीं। रिपोर्ट बताती है- बीमा कंपनियों पर लोगों का भरोसा डगमगाने लगा है।

स्वास्थ्य बीमा लेने वालों को उम्मीद रहती है कि इलाज के समय उन्हें बेहतर सुविधा और आर्थिक सहारा मिलेगा; मगर ताज़ा हालात में बीमा कंपनियों के रवैये ने इस विश्वास को हिला दिया है।

अस्पतालों का कहना है कि बीमा कंपनियाँ इलाज की दरों को 2022 से भी नीचे ले जाने का दबाव बना रही हैं। उनके अनुसार, ऐसे कदम से डॉक्टरों की उपलब्धता, आधुनिक उपकरणों के निवेश पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। हाल ही में सामने आए मामलों में प्रमुख अस्पताल-समूहों ने भी यही चिंता जताई है। उनका कहना है कि पुराने रेट्स पर इलाज करना संभव नहीं होगा और अगर ऐसी शर्तें थोप दी गईं तो इसका सीधा असर मरीज पर पड़ेगा।

इस विवाद का असर कैशलेस सुविधा पर भी दिखने लगा है। कई अस्पतालों में बीमा कंपनियों के साथ समझौते टल रहे हैं और कैशलेस इलाज अस्थायी रूप से रोका जा रहा है। कंपनियाँ इसे कागज़ी प्रक्रियाओं और अनुबंधों से जोड़ती हैं, लेकिन असली दिक़्क़त मरीजों के लिए है — उन्हें अचानक एडवांस भुगतान करना पड़ता है या फिर दूसरा अस्पताल ढूँढना पड़ता है। कई बार यही देरी मरीज की जान पर भारी पड़ सकती है।

पॉलिसीधारकों की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। हर साल प्रीमियम बढ़ रहा है, जबकि क्लेम न मिलने की समस्या लगातार गहराती जा रही है। इंश्योरेंस ओम्बुड्समैन रिपोर्ट 2023-24 भी स्थिति की गंभीरता बताती है। रिपोर्ट के अनुसार, स्टार हेल्थ, केयर और निवा बूपा जैसी कंपनियों पर सबसे अधिक शिकायतें दर्ज हुईं। अकेले स्टार हेल्थ के खिलाफ़ 13,308 शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें से अधिकांश क्लेम रिजेक्शन से जुड़ी थीं।

इसके साथ ही Incurred Claims Ratio (ICR) के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। कई बीमा कंपनियों का ICR केवल 54% से 67% के बीच रहा है। यानी ग्राहकों से वसूले गए प्रीमियम का बड़ा हिस्सा क्लेम पर खर्च ही नहीं हुआ। इसका मतलब है कि या तो क्लेम सही तरह से चुकाए नहीं जा रहे, या फिर कंपनियाँ मुनाफ़े को प्राथमिकता दे रही हैं। दोनों ही स्थितियाँ मरीजों के लिए नुकसानदेह हैं।

इस सबका नतीजा यह है कि आम आदमी, जो बीमा को अपनी सुरक्षा समझकर हर साल प्रीमियम देता है, वही सबसे ज़्यादा मुश्किलों का सामना कर रहा है। कभी उसे क्लेम न मिलने पर परेशान होना पड़ता है, तो कभी अस्पताल बदलना पड़ता है। आज स्थिति यह है कि बीमा पर लोगों का भरोसा डगमगाने लगा है। ऐसे में मरीज यह सोचने पर मजबूर हैं कि बीमा वास्तव में उनके लिए सहारा है या फिर एक और बोझ।

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