
Union Budget 2025: केंद्र की सत्ता में यूपीए के बाद एनडीए को आए एक दशक हो चुके हैं। देश की इकोनॉमी में तेजी से वृद्धि तो हुई ही है, देश का डिजिटल और फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। तेजी से हुआ यह बदलाव लोगों के जीवन पर भी पॉजिटिव असर डालने में सफल रहा। इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट ने लोगों को क्वालिटी लिविंग मुहैया कराई है। आईए जानते हैं यूपीए के बाद एनडीए सरकार के अस्तित्व में आने के एक दशक बाद तब और आज में क्या-क्या बदला?
आम लोगों के जीवन में मोबाइल ने क्रांति ला दी है। मोबाइल न केवल जीवन का एक हिस्सा बन चुका है बल्कि यह क्वालिटी ऑफ लिविंग को भी बढ़ाने में मददगार साबित हुआ है। यही वजह है कि डिजिटल होती दुनिया में तरक्कीवीर भारतवासी भी मोबाइल का उपयोग तेजी से बढ़ा रहे हैं। हालांकि, मोबाइल यूज बढ़ाने के पीछे इसकी कीमतें और उपलब्धता भी बेहद सहायक हैं। मोबाइल डेटा की दरें 2014 में 269 रुपये प्रति GB (यूपीए सरकार) से घटकर 2024 में मात्र 9.08 रुपये प्रति GB (एनडीए सरकार) हो गई हैं। वहीं, मोबाइल ब्रॉडबैंड स्पीड में भी भारी वृद्धि हुई है, जो मार्च 2014 में 1.30 Mbps थी, वह अब अक्टूबर 2024 में 95.67 Mbps तक पहुंच चुकी है।
देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 2014 में 387 (यूपीए) से बढ़कर 2024 में 780 (एनडीए) हो गई है। मेडिकल कॉलेजों में सीटों की संख्या 51348 से बढ़कर 118137 हो चुकी हैं। इसी तरह विश्वविद्यालयों की संख्या भी 2013-14 में 676 से बढ़कर 2022-23 में 1213 हो चुकी है। यह सुधार न केवल शिक्षा के अवसर बढ़ा रहे हैं, बल्कि युवाओं के भविष्य को भी उज्जवल बना रहे हैं।
ग्रामीण भारत में नल से जल योजना के तहत नल कनेक्शनों की संख्या अगस्त 2019 में 3.2 करोड़ से बढ़कर दिसंबर 2024 में 15.3 करोड़ हो गई है। इसके अलावा, एलपीजी कनेक्शनों की संख्या अप्रैल 2014 में 14.5 करोड़ से बढ़कर नवंबर 2024 में 32.8 करोड़ तक पहुंच चुकी है। जबकि पीएनजी कनेक्शन्स की संख्या 22.3 लाख से बढ़कर 1.36 करोड़ हो चुका है। देश में एक दशक पहले 85.1 प्रतिशत इलेक्ट्रिफिकेशन था अब शतप्रतिशत घरों में बिजली पहुंच चुकी है। यही नहीं, पहले ग्रामीण क्षेत्रों में 12.5 घंटे प्रति दिन बिजली रहती थी लेकिन अब 21.9 घंटे का यह औसत है। देश की विभिन्न योजनाओं के तहत एक दशक पहले 10.8 करोड़ लोगों को डीबीटी से सब्सिडी मिलती थी अब यह 170.3 करोड़ हो चुकी है।
स्वास्थ्य सूचकांकों में भी सुधार देखने को मिला है। शिशु मृत्यु दर 2014 में 39 प्रति 1000 जीवित जन्म से घटकर 2020 में 28 हो गई है। संस्थागत प्रसव का प्रतिशत 2015-16 में 78.9% से बढ़कर 2019-21 में 88.6% हो गया है। वहीं, स्वास्थ्य पर व्यक्तिगत खर्च का हिस्सा भी कुल स्वास्थ्य व्यय में 62% से घटकर काफी कम हो गया है।
औसत मासिक प्रति व्यक्ति खपत व्यय में शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में वृद्धि हुई है। गिनी गुणांक (आय असमानता का माप) में भी कमी आई है, जिससे सामाजिक समानता को बढ़ावा मिला है।
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