
बिजनेस डेस्क। छत्तीसगढ़ में रायपुर के एक गरीब किसान परिवार में पैदा हुए रामदेव अग्रवाल को लोग भारत के वॉरेन बफे के नाम से भी जानते हैं। वॉरेन बफे को अपना गुरु मानने वाले अग्रवाल ने अपने पिता से एक इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटजी सीखी और उसी के दम पर इन्वेस्टमेंट की दुनिया के बादशाह बने। जानते हैं मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के को-फाउंडर और मशहूर स्टॉक ट्रेडर रामदेव अग्रवाल की प्रेरणादायक कहानी।
रामदेव अग्रवाल की लाइफ में पहली बार सबसे बड़ा बदलाव तब आया, जब वे अपनी स्कूलिंग कम्पलीट करने के बाद हायर स्टडी (अकाउंटिंग की पढ़ाई) के लिए मुंबई पहुंचे। यहां वो जिस हॉस्टल में रहते थे, वहीं मोतीलाल ओसवाल भी रहते थे, जोकि शेयर मार्केट में काफी इंटरेस्टेड थे और अपना ज्यादा समय कंपनी रिपोर्ट्स और बैलेंस शीट पढ़ने में बिताते थे। चूंकि रामदेव अग्रवाल भी शेयर बाजार में रुचि लेते थे तो दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई। दोनों दोस्तों ने मिलकर सोचा कि थोड़े-बहुत पैसे बचाकर क्यों न शेयर मार्केट में लगाए जाएं। रामदेव अग्रवाल ने अपने पास जो भी पैसे बचा रखे थे, उसे उन्होंने शेयर मार्केट में लगाया और 1990 तक उनकी जमा पूंजी बढ़कर 10 लाख रुपए हो चुकी थी। इसके साथ ही वो BSE में स्टॉक ब्रोकर भी बन गए थे।
90 के दौर में ही दलाल-स्ट्रीट पर हर्षद मेहता की तूती बोलती थी। हर्षद मेहता ने जानबूझकर शेयर बाजार में तेजी लाने की तिकड़म लगाई और 1992 में प्रतिभूति घोटाला सामने आने तक जिसने भी इस दौर में पैसा लगाया, उन सभी ने कई गुना पैसा कमाया। इन्हीं दो साल में रामदेव अग्रवाल के 10 लाख रुपए 30 करोड़ रुपए बन चुके थे।
हालांकि, हर्षद मेहता का घोटाला सामने आते ही शेयर बाजार अचानक क्रैश हो गया। इसके साथ ही रामदेव अग्रवाल की इन्वेस्टमेंट वैल्यू भी 30 करोड़ से घटकर महज 10 करोड़ रुपए रह गई। ये देखकर उन्होंने सोचा कि अब पैसा बनाने के लिए अपनी स्ट्रैटेजी बदलने की जरूरत है। इसके बाद अग्रवाल 1994 में अमेरिका गए और वहां शेयरहोल्डर्स मीटिंग ऑफ बर्कशायर हैथवे को अटेंड किया। यहां उनकी मुलाकात अपने आइडल वॉरेन बफे से हुई।
वॉरेन बफे से मिलने के बाद रामदेव अग्रवाल को पता चला कि बफे हर साल अपने शेयरहोल्डर्स को एक लेटर लिखते हैं, जिससे शेयर मार्केट के बारे में काफी कुछ सीखा जा सकता है। अमेरिका से भारत लौटने के बाद अग्रवाल ने वॉरेन बफे के सारे लेटर्स को पढ़ा और एक स्ट्रैटेजी तैयार की। उस वक्त उनके पोर्टफोलियो में 225 कंपनियों के शेयर थे, जिनकी कुल वैल्यूएशन 10 करोड़ रुपए थी।
वॉरेन बफे के तमाम लेटर्स पढ़ने के बाद रामदेव अग्रवाल ने अपने पोर्टफोलियो के ज्यादातर शेयर बेच दिए और सिर्फ चुनिंदा 15 शेयर रखे। वो ये बात जान चुके थे कि शेयरों की क्वांटिटी से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, बल्कि स्टॉक्स की क्वालिटी से फर्क पड़ेगा कि उनके पास किन मजबूत कंपनियों के शेयर हैं। अपनी इस अप्रोच को उन्होंने 'फोकस्ड अप्रोच' नाम दिया।
रामदेव अग्रवाल ने 1996 में हीरो होंडा कंपनी के शेयर 30 रुपए के भाव पर खरीदे थे। 20 साल बाद यानी 2016 में उन्होंने इसे 2600 के भाव पर बेचा। यानी इस स्टॉक में उनकी रकम 86 गुना से ज्यादा बढ़ चुकी थी। इसी तरह, उन्होंने इन्फोसिस के स्टॉक से भी 12 गुना पैसा कमाया। आयशर कंपनी से भी अग्रवाल को अच्छा खास मुनाफा हुआ। इस तरह साल 2000 तक उनका पोर्टफोलियो बढ़कर 100 करोड़ के पार पहुंच गया।
फोर्ब्स की 2024 की लिस्ट के मुताबिक, रामदेव अग्रवाल 2.4 अरब डॉलर (करीब 20,400 करोड़ रुपए) के मालिक हैं। भारत के वॉरेन बफेट के नाम से मशहूर रामदेव अग्रवाल मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के को-फाउंडर हैं। 1987 में उन्होंने अपने मित्र मोतीलाल ओसवाल के साथ मिलकर मोतीलाल ओसवाल फाइनेंसियल सर्विसेज (MOFSL) की शुरुआत की। पहले वो खुद एक सब-ब्रोकर के रूप में काम करते थे। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंसियल सर्विसेज का मार्केट कैप फिलहाल 56,697 करोड़ रुपए का है।
(Disclaimer : शेयर बाजार में निवेश तमाम जोखिमों के अधीन है। किसी भी स्टॉक में निवेश से पहले किसी अच्छे एक्सपर्ट की राय जरूर लें)
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