
हर साल, मार्केटिंग इंडस्ट्री उम्मीदों और पॉज़िटिविटी से भरी-पूरी दिखती है। लेकिन जब कोई स्टेज, कोई पैनल या जज करने वाला कोई नहीं होता, तब असल में CMOs (चीफ मार्केटिंग ऑफिसर्स) क्या बात करते हैं? 'द CMO असेंबली' एक ऐसा ही एक्सक्लूसिव प्लेटफॉर्म है, जिसे खासतौर पर CMOs और कंज्यूमर-फेसिंग ब्रांड्स के सीनियर मार्केटिंग लीडर्स के लिए बनाया गया है। यह पारंपरिक पब्लिक मंचों और चिकनी-चुपड़ी बातों से हटकर है। यह प्लेटफॉर्म लीडर्स को एक भरोसेमंद माहौल देता है, जहां वे मार्केटिंग की असल मुश्किलों, सीखे हुए सबक और नए इनोवेशन पर खुलकर और ईमानदारी से बात कर सकते हैं। हाल ही में 'द CMO असेंबली' ने 'द इंडिया CMO इंडेक्स 2026' जारी किया है, जिसमें 11 इंडस्ट्रीज़ के 121 मार्केटिंग लीडर्स से गुमनाम तरीके से उनकी बेबाक राय ली गई है। यह इंडेक्स भारतीय मार्केटिंग लीडरशिप के सामने मौजूद अनोखे विरोधाभासों को दिखाता है—जिसमें शॉर्ट-टर्म परफॉर्मेंस के दबाव और लॉन्ग-टर्म ब्रांड वैल्यू बनाने के बीच की खींचतान भी शामिल है।
पेश हैं 'द CMO असेंबली' के फाउंडर विवेक शेठ के साथ हमारे एक्सक्लूसिव इंटरव्यू के कुछ अंश, जिसमें उन्होंने अपनी सोच, इस ऑर्गनाइजेशन को बनाने की वजह और बहुत कुछ बताया।
1. आपको भारत के मार्केटिंग इकोसिस्टम में ऐसी क्या कमी दिखी कि 'द CMO असेंबली' बनाने की ज़रूरत महसूस हुई?
जवाब: मुझे लगा कि भारत में CMOs के लिए ईमानदारी से बात करने की जगहों की भारी कमी है। यहां कॉन्फ्रेंस, पैनल, अवॉर्ड्स और नेटवर्किंग ग्रुप तो बहुत हैं, लेकिन ऐसी जगहें बहुत कम हैं जहां CMOs बिना किसी दिखावे के सच बोल सकें। ज़्यादातर बातचीत या तो बहुत बनावटी होती है, या PR से प्रभावित होती है, या फिर लेन-देन वाली होती है। सच्चाई यह है कि आज के CMOs बहुत सारी मुश्किलों से जूझ रहे हैं—बोर्ड का दबाव, AI से हो रहे बदलाव, लोगों का घटता अटेंशन स्पैन, परफॉर्मेंस का प्रेशर, ऑफिस की पॉलिटिक्स—लेकिन कोई ऐसा माहौल नहीं बना रहा था जहां वे इन सब पर अपने जैसे दूसरे लोगों से खुलकर बात कर सकें। 'द CMO असेंबली' इसी कमी को पूरा करने के लिए बनाई गई थी। यह कोई और इंडस्ट्री प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद कम्युनिटी है, जहां एक जैसे दबाव झेल रहे लोग आपस में सच्ची बातें कर सकें।
2. आपने कई बार कहा है कि ज़्यादातर मार्केटिंग कम्युनिटीज़ "CMOs से बात करती हैं" न कि "CMOs के साथ"। मौजूदा मॉडल में असल में क्या गड़बड़ है?
जवाब: आज के ज़्यादातर इकोसिस्टम विज़िबिलिटी (दिखने) के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, वल्नरेबिलिटी (अपनी कमज़ोरी बताने) के लिए नहीं। फॉर्मेट आमतौर पर एक जैसा होता है: एक स्टेज, एक मॉडरेटर, घिसे-पिटे सवाल, रटे-रटाए जवाब, स्पॉन्सर की बातें, और हर कोई ऐसे दिखाता है जैसे उसे सब कुछ पता है। लेकिन लीडरशिप की असली बातचीत ऐसे नहीं होती। CMOs को और ज़्यादा किताबी ज्ञान नहीं चाहिए। उन्हें अपने लेवल के लोगों से ईमानदारी भरी सलाह चाहिए। उन्हें ऐसी जगह चाहिए जहां वे कह सकें: 'यह कैंपेन फेल हो गया। मैं लॉन्ग-टर्म ब्रांड ROI साबित करने में संघर्ष कर रहा हूं। AI मेरी कंपनी को इतनी तेज़ी से बदल रहा है कि मैं उसके साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा। मुझे नहीं पता कि तीन साल बाद मार्केटिंग कैसी दिखेगी।' मौजूदा मॉडल निश्चितता को इनाम देता है। लेकिन बेहतरीन बातचीत अक्सर अनिश्चितता से ही शुरू होती है।
3. क्या कोई खास पल या बातचीत थी जिससे इस प्लेटफॉर्म का आइडिया आया?
जवाब: हां। मुझे याद है कि मैं इंडस्ट्री इवेंट्स के बाद CMOs से बात कर रहा था—स्टेज पर नहीं, बल्कि बाद में कॉफी या डिनर पर। उनकी प्राइवेट बातें पब्लिक में कही गई बातों से बिल्कुल अलग थीं। जो लोग स्टेज पर बहुत कॉन्फिडेंट दिख रहे थे, वे निजी तौर पर मानते थे कि वे बहुत ज़्यादा दबाव में हैं, मार्केटिंग के पुराने तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं, बोर्ड की उम्मीदों से जूझ रहे हैं, या इस बात को लेकर अनिश्चित हैं कि AI इंडस्ट्री को कहां ले जाएगा। यह अंतर मेरे दिमाग में बैठ गया। मैंने महसूस किया कि भारत में मार्केटिंग की सबसे कीमती बातचीत अनौपचारिक रूप से, बंद दरवाज़ों के पीछे हो रही है। 'द CMO असेंबली' इसी सोच से पैदा हुई कि शायद उन बातों को एक असली घर मिलना चाहिए।
4. आज CMOs निजी तौर पर किन बड़ी चिंताओं पर बात कर रहे हैं जो पब्लिक को नहीं दिखतीं?
जवाब: तीन बातें बार-बार सामने आती हैं। पहली, रेलेवेंस (प्रासंगिकता)। कई मार्केटर्स सोच रहे हैं कि क्या ब्रांड बनाने के पारंपरिक तरीके AI-फर्स्ट और ध्यान भटकाने वाली इस दुनिया में अब भी काम करते हैं। दूसरी, मेज़रमेंट (माप)। खर्च किए गए हर रुपये का हिसाब देने का बहुत दबाव है, लेकिन हर कीमती चीज़ को तुरंत मापा नहीं जा सकता। CMOs शॉर्ट-टर्म परफॉर्मेंस की उम्मीदों और लॉन्ग-टर्म ब्रांड बनाने के बीच फंसे हुए हैं। तीसरी, आइडेंटिटी (पहचान)। AI लीडर्स को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि भविष्य में मार्केटिंग टीमों को कैसा दिखना चाहिए। कई लोग पूछ रहे हैं: मार्केटिंग में अब इंसानों का यूनिक काम क्या बचेगा?
5. क्या आज के CMOs पर मार्केटिंग खर्च और ROI को सही ठहराने का दबाव पहले से कहीं ज़्यादा है?
जवाब: बिल्कुल। पहले मार्केटिंग के पास यह सुविधा थी कि नतीजों का असर बाद में दिखता था। आज, लीडरशिप टीमें नतीजों, एफिशिएंसी और बिजनेस पर असर के बारे में तुरंत स्पष्टता चाहती हैं। चुनौती यह है कि मार्केटिंग दो टाइमलाइन पर काम करती है: शॉर्ट-टर्म में रेवेन्यू पर असर और लॉन्ग-टर्म में ब्रांड की याद। खतरा तब होता है जब कंपनियां सिर्फ उन चीज़ों पर फोकस करती हैं जिन्हें शॉर्ट-टर्म में मापा जा सकता है। हो सकता है कि आप तिमाही नतीजों में सुधार कर लें, लेकिन धीरे-धीरे ब्रांड की पहचान को कमज़ोर करते जाएं। आज के CMOs से सिर्फ ग्रोथ लाने की उम्मीद नहीं की जाती, बल्कि उनसे हर फैसले को रियल टाइम में सही ठहराने की भी उम्मीद की जाती है।
6. क्या AI ने मार्केटिंग लीडर्स के बीच होने वाली बातचीत के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है?
जवाब: पूरी तरह से। एक साल पहले, AI पर बातचीत ज़्यादातर जिज्ञासा से भरी होती थी। आज, यह अस्तित्व का सवाल बन गई है। बातचीत का टोन "AI हमारी क्या मदद कर सकता है?" से बदलकर "अगर AI ने सब कुछ बदल दिया तो मार्केटिंग ऑर्गनाइजेशंस का क्या होगा?" हो गया है। CMOs अब छोटी टीमों, AI से बनी क्रिएटिविटी, सिंथेटिक कंज्यूमर्स, बड़े पैमाने पर पर्सनलाइजेशन और उपभोक्ता व्यवहार कितनी जल्दी बदल सकता है, इस पर चर्चा कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि सबसे स्मार्ट लीडर्स AI को सिर्फ एक प्रोडक्टिविटी टूल नहीं मान रहे हैं। वे इसे एक ऐसे बुनियादी बदलाव के रूप में देख रहे हैं जो ब्रांड बनाने के तरीके को ही बदल देगा।
7. इन बंद कमरों की बैठकों में मार्केटर्स आखिरकार कौन सा एक कड़वा सच मान रहे हैं?
जवाब: यह कि अब किसी को भी पूरी तरह से नहीं पता कि मार्केटिंग का भविष्य कैसा दिखेगा। सालों तक, इस इंडस्ट्री ने आत्मविश्वास और निश्चितता को इनाम दिया। लेकिन निजी तौर पर, कई लीडर्स मान रहे हैं कि पुराने तरीके अब कम भरोसेमंद होते जा रहे हैं। ग्राहकों का ध्यान बंटा हुआ है। ब्रांड के प्रति वफादारी कमज़ोर हो गई है। एल्गोरिदम तय करते हैं कि क्या दिखेगा। AI क्रिएटिविटी को नया आकार दे रहा है। और सिर्फ परफॉर्मेंस मार्केटिंग से मज़बूत ब्रांड नहीं बनाए जा सकते। कड़वा सच यह है कि सबसे अनुभवी मार्केटर्स भी अब रियल टाइम में फिर से सीख रहे हैं।
8. एक-दूसरे से मुकाबला करने वाले CMOs के बीच भरोसा बनाना मुश्किल लगता है। आप ऐसा माहौल कैसे बनाते हैं जहां लोग वाकई खुलकर बात करें?
जवाब: भरोसा इरादे से आता है। जैसे ही लोगों को लगता है कि कोई प्लेटफॉर्म मुख्य रूप से दिखावे, कुछ बेचने या फायदा उठाने के लिए है, ईमानदारी गायब हो जाती है। 'द CMO असेंबली' में, हम ऐसे माहौल बनाने पर बहुत ध्यान देते हैं जहां बेहतर दिखने का कोई दबाव न हो। छोटे ग्रुप्स, नॉन-रिकॉर्डेड सेशन और भी बहुत कुछ। हैरानी की बात है कि जब लोगों को यह एहसास होता है कि उन्हें किसी को इम्प्रेस करने की ज़रूरत नहीं है, तो बातचीत कहीं ज़्यादा कीमती हो जाती है। सीनियर लीडर्स को असल में और ज़्यादा नेटवर्किंग नहीं चाहिए। उन्हें कम, लेकिन ज़्यादा सार्थक बातचीत चाहिए।
9. 'द CMO असेंबली' लॉन्च करने के बाद आपको सबसे ज़्यादा किस बात ने हैरान किया?
जवाब: इस बात ने कि CMOs ईमानदारी से बात करने के लिए कितने बेताब थे। मुझे दिलचस्पी की उम्मीद थी। लेकिन मुझे CMOs से इतनी इमोशनल ओपननेस देखने की उम्मीद नहीं थी। बहुत से CMOs दबाव को बहुत निजी तौर पर झेलते हैं। बाहर से, मार्केटिंग लीडरशिप ग्लैमरस दिखती है। अंदर से, यह अकेलापन भरा हो सकता है। मुझे सबसे ज़्यादा इस बात ने हैरान किया कि जैसे ही लीडर्स को एहसास हुआ कि यह एक ऐसी जगह है जहां उन्हें 'सब कुछ कंट्रोल में है' वाली इमेज बनाए रखने की ज़रूरत नहीं है, उन्होंने कितनी जल्दी रिस्पॉन्स दिया।
10. क्या सीनियर लीडर्स को एक नए, लीक से हटकर बने प्लेटफॉर्म पर भरोसा करने के लिए मनाना मुश्किल था?
जवाब: शुरुआत में, हां। क्योंकि इस क्षेत्र में भरोसा धीरे-धीरे कमाया जाता है। सीनियर लीडर्स ने बहुत सी कम्युनिटीज़ को लेन-देन वाला और बहुत ज़्यादा कमर्शियल होते देखा है। हमने कभी भी आक्रामक रूप से आगे बढ़ने या दिखावा करने की कोशिश नहीं की। हमने स्केल के बजाय गहराई पर और विज़िबिलिटी के बजाय बातचीत पर ध्यान केंद्रित किया। समय के साथ, भरोसा बढ़ता है। जब एक सम्मानित लीडर को एक सार्थक अनुभव मिलता है, तो वे दूसरों को भी लाते हैं। यह ऑर्गेनिक तरीके से भरोसा बनाना पारंपरिक ग्रोथ की तरकीबों से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली रहा है।
11. अब से पांच साल बाद—आप 'द CMO असेंबली' को क्या बनते देखना चाहते हैं?
जवाब: एक नेटवर्क, एक आंदोलन, एक थिंक टैंक, या कुछ बड़ा? मैं चाहता हूं कि यह इस क्षेत्र में CMOs के लिए सबसे भरोसेमंद इकोसिस्टम में से एक बन जाए—इसलिए नहीं कि यह सबसे बड़ा है, बल्कि इसलिए कि यह सबसे ईमानदार है। एक ऐसी जगह जहां इंडस्ट्री की असली सोच उभरती है, सार्थक रिसर्च होती है, भविष्य के मार्केटिंग लीडर्स तैयार होते हैं, और मुश्किल बातचीत मुख्यधारा में आने से पहले होती है। मुझे लगता है कि भविष्य उन कम्युनिटीज़ का है जो सिर्फ विज़िबिलिटी नहीं, बल्कि क्लैरिटी पैदा करती हैं। हम 'द मार्केटिंग असेंबली' नाम से भी कुछ चलाते हैं—जो पूरे मार्केटिंग इकोसिस्टम के लिए खुला है—उसका इरादा भी यही है—लोग एक-दूसरे को आगे बढ़ने में मदद करें!
12. अगर आप भारत के हर CMO को निजी तौर पर एक बेहद ईमानदार सवाल का जवाब देने के लिए मजबूर कर सकें, तो वह सवाल क्या होगा?
जवाब: मैं पूछूंगा: अगर कोई नहीं देख रहा होता, तो आप कल से मार्केटिंग में क्या करना बंद कर देंगे? क्योंकि यह सवाल सब कुछ उजागर कर देता है: वे मेट्रिक्स जिन पर हम मन-ही-मन विश्वास नहीं करते, वे कैंपेन जो हम दिखावे के लिए चलाते हैं, वे मीटिंग्स जिनसे कोई फायदा नहीं होता, वे रिपोर्ट्स जिन्हें कोई नहीं पढ़ता, और इंडस्ट्री की वे आदतें जिन्हें हम सिर्फ इसलिए जारी रखते हैं क्योंकि बाकी सब भी ऐसा ही कर रहे हैं। यहीं से मार्केटिंग पर ईमानदार बातचीत शुरू होती है।
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