गांव वालों के ताने सुनते गरीबी में पलने वाला शख्स बन गया IPS, पिता की 200 रुपये सेलरी से चलता था घर खर्च

Published : Feb 02, 2020, 11:45 AM ISTUpdated : Feb 02, 2020, 12:51 PM IST
गांव वालों के ताने सुनते गरीबी में पलने वाला शख्स बन गया IPS, पिता की 200 रुपये सेलरी से चलता था घर खर्च

सार

किसी ने  सच ही कहा है सफलता किसी सुविधा की मोहताज नहीं होती। आज हम आपको एक ऐसे ही IPS अफसर के संघर्षों और सफलता की कहानी बताने जा रहे हैं। जी हां बेहद गरीब परिवार में जन्मे IPS अनीस अहमद अंसारी का जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा है

लखनऊ(Uttar Pradesh ). किसी ने  सच ही कहा है सफलता किसी सुविधा की मोहताज नहीं होती। आज हम आपको एक ऐसे ही IPS अफसर के संघर्षों और सफलता की कहानी बताने जा रहे हैं। जी हां बेहद गरीब परिवार में जन्मे इस आईपीएस का जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। पिता एक मदरसे में शिक्षक थे और उनकी सेलरी इतनी कम थी कि उसमे गुजारा करना ही मुश्किल था। 38 वीं वाहिनी पीएसी अलीगढ़ के कमांडेंट IPS अनीस अहमद अंसारी ने ASIANET NEWS HINDI से बात की। इस दौरान उन्होंने अपने संघर्षों व सफलता की कहानी बताई।  

मूल रूप से सिद्धार्थनगर जिले के रहने वाले अनीस अहमद अंसारी 2010 बैच के IPS (इंडियन पुलिस सर्विसेज) अधिकारी हैं। वर्तमान में वह अलीगढ़ में पीएसी की 38 वीं बटालियन में कमांडेट हैं। अनीस अहमद अंसारी अपराधियों के खिलाफ अपनी सख्ती के लिए काफी मशहूर हैं। उनकी जिन जिले में बतौर SP तैनाती रही वह खासे चर्चित रहे। 

पिता की 200 रुपये सेलरी से चलता था घर 
IPS अनीस अहमद अंसारी ने बताया "हम दो भाई और एक बहन में सबसे छोटे थे। पिता जी गांव के ही एक मदरसे में शिक्षक थे। उनकी सेलरी मात्र 200 रुपये थी। उन्ही 200 रुपये में घर भी चलता था और सबकी पढ़ाई लिखाई भी। लेकिन ये सब कैसे पूरा होता था उसे बता पाना बेहद मुश्किल है। लेकिन पिता जी ने कभी हार नहीं मानी। पिता जी के द्वारा किए जा रहे संघर्षों को देखकर मन में काफी आत्मविश्वास आता था। 

पिता की डांट-मार ने दिखाया रास्ता 
अनीस बताते हैं, "बचपन से ही मेरा मन पढ़ने में नहीं लगता था। क्लास 5 तक मै गांव के ही मदरसे में पढ़ा। पिता जी भी उसी स्कूल में शिक्षक थे। मैं स्कूल में बैग छोड़कर फरार हो जाता था और खेतों में जाकर छिप जाता था। पिता जी मुझे पकड़ने के लिए स्कूल के दर्जनों बच्चों को भेजते, उनकी पकड़ से बचने के लिए मै उनपर खूब पत्थर बरसाता था। फिर दोनों तरफ से जमकर पत्थर चलते थे। जब मैं पत्थर चलाकर थक जाता था तो वहां से भागने लगता और बच्चे मुझे पकड़कर पिता जी के पास ले जाते। इसके बाद छड़ी की वो मार आज भी याद कर सिहर जाता हूं। लेकिन उसी मार और अनुशासन ने मेरी जिंदगी बदल दिया। 

गांव वाले पिता पर करते थे कमेंट 
अनीस ने बताया " बचपन में मेरा मन पढ़ने में नहीं लगता था, जिसके कारण मुझे खूब मार पड़ती थी। गांव वाले पिता जी पर कमेंट करते थे- पढ़ने के लिए मार रहे हैं, जैसे आईएएस-आईपीएस बनाएंगे। उस समय मेरे भी मन में एक बात आती थी कि ये आईपीएस-आईएएस कोई बहुत बड़ी चीज होती होगी। लेकिन मेरे पिता जी भी गर्व से कहते थे बिल्कुल आईपीएस अफसर ही बनाऊंगा। पिता की वही बातें आगे चल कर मेरे लिए आदर्श बनीं।"

गांव वालों के तानों से मन में कुछ बनने का आया जज्बा 
अनीस बताते हैं "मेरी शरारतों से आजिज आकर पिता जी ने गांव के बाहर स्कूल में मेरा एडमिशन करा दिया गया। वहां से भागने का कोई मौका नहीं मिलता, इसलिए पढ़ने का मन बना लिया। वहां जाने के बाद गांव वालों द्वारा मुझे लेकर पिता की को दिए जाने वाले ताने हमेशा जहन में याद रहते। उन्हें याद करते ही मै बेचैन हो जाता था। इंटरमीडिएट के बाद आगे की पढ़ाई के लिए मैं अलीगढ़ आ गया। उसके बाद मैंने बीटेक पूरा किया। फिर मुझे 2007 में BHEL,भोपाल में नौकरी मिल गई। नौकरी मिलने के बाद काफी परेशानियां तो कम हो गयी लेकिन पिता के अफसर बनाने के शब्द जब याद आते तो काफी परेशान हो जाता था। वही सपना पूरा करने के लिए 2008 में मै दिल्ली आ गया। वहां सिविल सर्विस की तैयारी में लग गया। 2010 में मेरा सि‍लेक्शन सेकंड अटेंप्ट में इंडियन पुलिस सर्विसेज (IPS) में हो गया।

अमेठी व फतेहपुर में तैनाती के दौरान चर्चा में रहे थे अनीस 
अनीस अहमद अंसारी पिछली सरकार में अमेठी व फतेहपुर में बतौर पुलिस अधीक्षक तैनात रहे थे। इन दोनों जिलों में उनकी खासी चर्चा रही थी। किसी भी बड़े अपराध के बाद अपराधियों की धरपकड़ में पुलिस टीम को खुद लीड करना उनकी सबसे बड़ी खासियत थी। अमेठी में सत्ता पक्ष के एक विधायक द्वारा बीच चौराहे पर की जा रही गुंडई के बाद विधायक को गिरफ्तार कर पुलिस जीप में बैठाकर थाने लाने के बाद वह खूब सुर्ख़ियों में रहे थे। जिस जिले से उनका तबादला हुआ लोगों ने उन्हें फूल मालाओं से लाद कर उनकी विदाई की। यही नहीं लोग उनके जाने पर भावुक हो जाते थे। 

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