Shaheed Diwas 2023 : डरे-सहमे अंग्रेजों ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को एक दिन पहले ही दे दी फांसी, जानें शहीद दिवस का पूरा इतिहास

Published : Mar 23, 2023, 08:00 AM IST
Shaheed Diwas 2023

सार

8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश भारत की सेंट्रल असेंबली में बम फेंक दिया। बम जानबूझकर कर सभागार के बीच में फेंके गए थे, जहां कोई मौजूद नहीं था। बम फेंकने के बाद दोनों क्रांतिकारी भागे नहीं बल्कि वहीं खड़े रहे और गिरफ्तारी दी।

करियर डेस्क : आज शरीद दिवस (Shaheed Diwas 2023) है। आज ही के दिन 1931 में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी। उनकी कुर्बानी की याद में हर साल आज ही के दिन शहीद दिवस मनाया जाता है। पहले तीनों क्रांतिकारियों को 24 मार्च, 1931 को फांसी देना तय किया गया था लेकिन ब्रिटिश सरकार को डर था कि फांसी के दौरान माहौल बिगड़ सकता है। इसलिए नियमों को दरकिनार करते हुए ब्रिटिश सरकार ने तीनों क्रांतिकारियों को चुपचाप एक रात पहले ही लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई थी। आइए जानते हैं शहीद दिवस का पूरा इतिहास...

शहीद दिवस का इतिहास

भगत सिंह (Bhagat Singh) का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के लायलपुर में बंगा गांव में हुआ था। यह गांव वर्तमान में पाकिस्तान में है। जलियावाला बाग कांड के दौरान उनकी उम्र सिर्फ 12 साल ही थी। इस नरसंहार के बाद उनका मन गुस्से से भर गया था। अंग्रेजों के खिलाफ उनमें काफी गुस्सा था। जब काकोरी कांड हुआ और क्रांतिकारियों को फांसी दी गई तो भगत सिंह का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। इसके बाद भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद के हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को जॉइन कर लिया।

साइमन कमीशन का विरोध, सांडर्स की हत्या

1928 की बात है, जब साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा था। इस विरोध को दबाने के लिए अंग्रेजों ने लाठीचार्ज कर दिया। इस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय के सिर में गंभीर चोटें आईं और उनकी मौत हो गई। इस मौत का बदला लेने के लिए क्रांतिकारियों ने पुलिस सुपरिटेंडेंट स्कॉट की हत्या का प्लान तैयार किया। 17 दिसंबर 1928 की बात है, जब स्कॉट की हत्या की योजना बन रही थी लेकिन उसकी जगह अंग्रेज अधिकारी जेपी सांडर्स पर हमला किया गया। इस हमले में उसकी मौत हो गई।

सेंट्रल असेंबली में बमबाजी, भगत सिंह को फांसी

8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश भारत की सेंट्रल असेंबली में बम फेंक दिया था। बम जानबूझकर कर सभागार के बीच में फेंके गए थे, जहां कोई मौजूद नहीं था। बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने भागने की बजाय वहीं खड़े रहे और गिरफ्तारी दी। करीब दो साल तक जेल में रहने के बाद 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह को राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी पर चढ़ा दिया गया। वहीं, बकुटेश्वर दत्त को आजीवन कारावास की सजा हुई। इन भारत माता के सपूतों की कुर्बानी की याद में हर साल आज ही के दिन शहीद दिवस मनाया जाता है।

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