
IAS Officers in Politics: सरकारी व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए सिविल सेवा छोड़कर राजनीति में उतरना आसान फैसला नहीं है। लेकिन असली चुनौती इस्तीफे के बाद शुरू होती है। पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने नई पार्टी जन नीति भारत बनाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में कदम रखा है। उन्होंने व्यवस्था में काम करने की इच्छा की कमी को अपने फैसले की वजह बताया है। उनका लक्ष्य 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव है। लेकिन क्या प्रशासनिक अनुभव राजनीति में सफलता की गारंटी बन सकता है? जानिए अरविंद केजरीवाल से लेकर शाह फैसल तक, ऐसे पांच अधिकारियों की कहानियां जो IAS, IPS, IRS जैसी प्रशासनिक नौकरी छोड़ कर राजनीति में आए और आज वे कहां हैं?
भारतीय राजस्व सेवा (IRS) छोड़ने के बाद केजरीवाल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़े और 2012 में आम आदमी पार्टी (AAP) बनाई। साल 2015 में पार्टी ने दिल्ली की 70 में से 67 सीटें जीतकर बड़ी सफलता हासिल की। केजरीवाल मुख्यमंत्री भी बने, लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में AAP सत्ता से बाहर हो गई। वह अब भी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक हैं।
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कर्नाटक कैडर के IAS अधिकारी सेंथिल ने 2019 में इस्तीफा दिया था। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और 2024 के लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु की तिरुवल्लूर सीट से जीतकर सांसद बने। उनका सफर दिखाता है कि किसी स्थापित राजनीतिक संगठन के साथ काम करना भी राजनीति में आगे बढ़ने का रास्ता हो सकता है।
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटाए जाने और संचार पाबंदियों के विरोध में गोपीनाथन ने 2019 में इस्तीफा दिया था। अक्टूबर 2025 में वह कांग्रेस में शामिल हुए। उनके मुताबिक, केंद्र सरकार ने उनका इस्तीफा अब तक स्वीकार नहीं किया है। इस वजह से उनके राजनीतिक भविष्य पर प्रशासनिक प्रक्रिया का असर बना हुआ है।
तमिलनाडु के पूर्व IPS अधिकारी अन्नामलाई BJP के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। पार्टी नेतृत्व से रणनीतिक मतभेदों के बाद उन्होंने 2025 में BJP छोड़ी और ‘We The Leaders’ नाम से नया आंदोलन शुरू किया। अब उनकी राजनीति की दिशा इस नए मंच के कामकाज से तय होगी।
2010 के UPSC टॉपर शाह फैसल ने 2019 में IAS से इस्तीफा देकर जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट बनाई। हालांकि, बाद में उन्होंने राजनीति से दूरी बनाई। केंद्र सरकार ने 2022 में उनका इस्तीफा वापस लेने की अनुमति दी और वह फिर सरकारी सेवा में लौट आए।
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इन पांच कहानियों से साफ है कि सिविल सेवा का अनुभव राजनीति में प्रवेश का आधार तो बन सकता है, लेकिन आगे का रास्ता संगठन, जनसमर्थन और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कोई अपनी पार्टी बनाता है, कोई स्थापित दल में जगह बनाता है और कोई वापस सरकारी सेवा में लौट जाता है। दिव्या मित्तल के सामने भी अब यही चुनौती है, अपने प्रशासनिक अनुभव को जनता के भरोसे और चुनावी समर्थन में बदलना।
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