
एक एम्प्लॉई ने बताया है कि कैसे एक भारतीय कंपनी में इंटर्नशिप के दौरान एक सहकर्मी पर भरोसा करने की वजह से शायद उसकी पक्की नौकरी चली गई। रेडिट के 'इंडियन वर्कप्लेस' फोरम पर, इस वर्कर ने अपनी आपबीती एक पोस्ट में शेयर की, जिसका टाइटल था, "वर्कप्लेस पर भरोसे को लेकर एक सबक जो मैंने बहुत मुश्किल से सीखा।"
वर्कर ने बताया कि वह एक सॉफ्टवेयर कंपनी में तीन महीने से इंटर्न के तौर पर कड़ी मेहनत कर रहा था, ताकि उसे परमानेंट जॉब मिल सके। इसी दौरान, एक नए इंटर्न ने कंपनी जॉइन की और बहुत जल्दी एचआर (HR) टीम के करीब आ गया। शुरुआत में इस वर्कर ने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
बाद में उसने उस नए सहकर्मी को दोस्त समझकर ऑफिस की कुछ परेशानियां बता दीं। इसमें यह भी शामिल था कि कैसे उसका टीम लीड उसके काम का क्रेडिट खुद ले लेता है। वर्कर ने लिखा, "मैंने एक दिन उसे अपनी भड़ास निकालकर गलती कर दी। मुझे लगा कि वह मेरा दोस्त है। मैंने उस पर भरोसा किया।"
वर्कर ने आगे लिखा, "अब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो एक संकेत था जिसे मैंने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उसी इंटर्न ने एक बार बातों-बातों में मुझे बताया था कि कैसे स्कूल में उसने परीक्षा से पहले एक टॉपर की रिवीजन नोटबुक फेंक दी थी। बस यूं ही। कोई पछतावा नहीं, कुछ नहीं। उसने मुझे यह कहानी ऐसे सुनाई जैसे कोई मजेदार याद हो। लोग आपको बता देते हैं कि वे असल में कैसे हैं, बस हम ही ध्यान नहीं देते।"
इस बातचीत के कुछ ही समय बाद, उसके टीम लीड का बर्ताव बदल गया। जब परमानेंट नौकरी मिलने का समय आया, तो वर्कर को बताया गया कि उसकी इंटर्नशिप तीन महीने के लिए बढ़ाई जा रही है। उसे कहा गया, "तुम्हें तीन महीने के एक्सटेंशन की जरूरत है। तुम अकेले काम नहीं कर सकते। तुम्हारी एनालिटिकल थिंकिंग बहुत अच्छी है, लेकिन फिर भी तुम्हें एक्सटेंशन चाहिए।"
यह फैसला हैरान करने वाला था, खासकर इसलिए क्योंकि एक फुल-टाइम सहकर्मी ने उसे बताया था कि उसके पक्का होने के काफी अच्छे चांस हैं। जब वर्कर ने इस घटना के बारे में सोचा, तो उसे उस इंटर्न की स्कूल वाली बात याद आ गई, जिसमें उसने एक क्लासमेट को नीचा दिखाया था। वर्कर ने यह भी बताया कि इस झटके की वजह से उसका एक पर्सनल प्लान भी टल गया। वह नौकरी पक्की होने के बाद अपनी मां का इलाज करवाना चाहता था।
इस पोस्ट पर ऑनलाइन लोगों ने मिली-जुली प्रतिक्रिया दी। कुछ यूजर्स ने ऑफिस में सीमाएं बनाए रखने की अहमियत पर जोर दिया, तो कुछ ने सहानुभूति जताते हुए इसे एक कड़वा सबक बताया। एक यूजर ने लिखा, "लोग ऑफिस में दोस्त नहीं बनाते - यह सिर्फ सोशल और फॉर्मल बातचीत होती है।" वहीं एक दूसरे यूजर ने कहा कि वह काम से जुड़ी बातें सहकर्मियों से करने से पूरी तरह बचता है।
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