
Hybrid School Model Return: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील- कुछ समय के लिए ऑनलाइन मीटिंग्स और क्लासेज को बढ़ावा दें, ने देशभर के छात्रों और अभिभावकों के बीच नई चर्चा छेड़ दी है। बढ़ती वैश्विक तेल कीमतों और ईंधन बचत की जरूरत के बीच दिए गए इस बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि क्या स्कूल फिर से कोरोना काल जैसा हाइब्रिड या ऑनलाइन मॉडल अपनाने जा रहे हैं? हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ है, लेकिन स्कूलों में चल रही अंदरूनी चर्चाओं ने पैरेंट्स की चिंता बढ़ा दी है।
प्रधानमंत्री की अपील के बाद देश भर के विभिन्न राज्यों के कई स्कूलों में वैकल्पिक शिक्षण मॉडल पर विचार शुरू हो गया है। कुछ संस्थान सीमित स्तर पर हाइब्रिड व्यवस्था की संभावना देख रहे हैं, जहां चुनिंदा कक्षाओं को ऑनलाइन शिफ्ट किया जा सकता है, जबकि बाकी छात्रों की फिजिकल क्लासेज जारी रहेंगी। लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी समस्या स्पष्टता की कमी है। न तो शिक्षा विभाग की ओर से कोई औपचारिक सर्कुलर आया है और न ही स्कूलों ने एक समान नीति बनाई है। ऐसे में अभिभावक समझ नहीं पा रहे कि बच्चों की रेगुलर स्कूलिंग जारी रहेगी या अचानक डिजिटल मोड में बदलाव होगा।
कोरोना महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई के अनुभव अभी भी परिवारों के लिए आसान मेमोरी नहीं हैं। कई अभिभावकों का कहना है कि अगर फिर से ऑनलाइन क्लासेज शुरू होती हैं तो बच्चों की स्क्रीन टाइम समस्या, पढ़ाई में ध्यान की कमी जैसी चुनौतियां दोबारा सामने आ सकती हैं। वर्किंग पैरेंट्स के लिए स्थिति और मुश्किल हो सकती है। घर से काम और बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई को एक साथ मैनेज करना पहले भी तनाव का कारण बना था। ऐसे में अचानक किसी नई व्यवस्था का संकेत परिवारों की चिंता बढ़ा रहा है।
मिडिल और सीनियर क्लास के छात्रों का कहना है कि ऑनलाइन क्लासेज की चर्चा से उनकी एग्जाम प्रिपरेशन और समर प्लानिंग प्रभावित हो रही है। कई छात्र यह जानना चाहते हैं कि अगर स्कूल हाइब्रिड मॉडल अपनाते हैं तो अटेंडेंस कैसे मैनेज होगी? टेस्ट और असेसमेंट ऑनलाइन होंगे या ऑफलाइन? क्या सभी क्लासेज पर एक जैसी व्यवस्था लागू होगी? लगातार बदलती चर्चाओं और स्कूलों की अलग-अलग प्रतिक्रियाओं ने छात्रों और पैरेंट्स की रूटीन प्लानिंग को सस्पेंस में डाल दिया है।
स्कूल प्रशासन अभी वेट एंड वॉच मोड में हैं।समर वेकेशन शुरू होने के कारण भी स्थिति और उलझी हुई है। कुछ स्कूल यह मान रहे हैं कि अगर कोई बदलाव होता भी है, तो वह छुट्टियों के बाद लागू किया जा सकता है। स्कूल प्रबंधन यह भी देख रहे हैं कि ऑनलाइन और ऑफलाइन मॉडल का संतुलन कैसे बनाया जाए ताकि पढ़ाई प्रभावित न हो और अभिभावकों पर अतिरिक्त दबाव भी न पड़े।
सरकार की चिंता का केंद्र बढ़ती वैश्विक तेल कीमतें हैं। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है, जिसका असर भारत के ईंधन आयात खर्च पर पड़ रहा है। राजधानी दिल्ली समेत देश के विभिन्न राज्यों के बड़े शहरों में हजारों स्कूल बसें रोज डीजल पर चलती हैं। ऐसे में यदि कुछ दिनों के लिए ऑनलाइन या हाइब्रिड क्लासेज अपनाई जाती हैं, तो ईंधन खपत में कमी लाई जा सकती है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह का कदम केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक संतुलन का भी विषय है।
फिलहाल छात्रों और अभिभावकों को घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऑनलाइन क्लासेज को लेकर कोई सरकारी आदेश जारी नहीं हुआ है। स्कूलों को अभी तक बाध्यकारी निर्देश नहीं मिले हैं। अधिकतर संस्थान केवल संभावनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। अंतिम फैसला राज्य शिक्षा विभाग की मंजूरी के बाद ही संभव होगा। यानी अभी स्थिति पूरी तरह संभावना के स्तर पर है, लेकिन प्रधानमंत्री की अपील ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि आने वाले दिनों में स्कूलिंग मॉडल को लेकर नई रणनीतियां सामने आ सकती हैं।
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