Toxic Work Culture: 'छुट्टी हमारा हक़ है, एहसान नहीं', जानें क्यों वायरल हो रहा महिला का वीडियो

Published : May 25, 2026, 02:29 PM IST
Toxic Work Culture: 'छुट्टी हमारा हक़ है, एहसान नहीं', जानें क्यों वायरल हो रहा महिला का वीडियो

सार

एक महिला के वायरल वीडियो ने टॉक्सिक वर्क कल्चर पर बहस छेड़ दी है। उसने कहा कि पेड लीव कर्मचारियों का अधिकार है, कोई एहसान नहीं। इससे कर्मचारियों ने काम के दबाव और छुट्टी लेने में होने वाली शर्मिंदगी पर अपने अनुभव साझा किए।

एक महिला का वायरल वीडियो इंटरनेट पर छाया हुआ है, जिसमें उसने ऑफिस के खराब माहौल (टॉक्सिक वर्क कल्चर) और पेड लीव को लेकर बड़ी बात कही है। इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। हज़ारों कर्मचारी उसकी बातों से सहमत दिखे और काम के बढ़ते बोझ, अपराध बोध और कंपनियों की गलत उम्मीदों पर अपने अनुभव शेयर किए।

यह वीडियो सोशल मीडिया पर तब वायरल हुआ जब महिला ने जोर देकर कहा कि सैलरी के साथ मिलने वाली छुट्टियां (पेड लीव) कर्मचारियों का बुनियादी अधिकार हैं, इसे मैनेजर या कंपनी का 'एहसान' नहीं समझना चाहिए। उसकी इस बात पर नौकरीपेशा लोगों ने जमकर रिएक्शन दिए और छुट्टी लेने पर होने वाली शर्मिंदगी, काम के भारी दबाव और खराब वर्क-लाइफ बैलेंस से जुड़े अपने अनुभव साझा किए।

अब वायरल हो चुके इस क्लिप में महिला कहती है, “पेड लीव हमारा अधिकार है, कोई एहसान नहीं।” उसने ऐसे ऑफिस कल्चर की आलोचना की, जहां कर्मचारी अपनी मंज़ूर हो चुकी छुट्टियों को लेने में भी हिचकिचाते हैं या दोषी महसूस करते हैं। उसने तर्क दिया कि कर्मचारियों को बार-बार छुट्टी लेने की वजह बताने या ऑफिस के काम के लिए हर समय उपलब्ध रहने के दबाव में नहीं होना चाहिए।

यहां देखें वायरल वीडियो 

यह बात ऑनलाइन, खासकर युवा कर्मचारियों के दिलों में उतर गई, जो काम के बढ़ते घंटे और बर्नआउट कल्चर से जूझ रहे हैं। कई यूजर्स ने कहा कि यह वीडियो कॉर्पोरेट ऑफिस की हकीकत को दिखाता है, जहां आधिकारिक HR पॉलिसी के बावजूद छुट्टी लेने को गलत माना जाता है।

एक यूजर ने कमेंट किया, “कर्मचारियों को उन फायदों के लिए भी दोषी महसूस कराया जाता है जो उन्होंने खुद कमाए हैं।” वहीं एक अन्य ने लिखा, “वर्क-लाइफ बैलेंस तो बस कंपनी के प्रेजेंटेशन में ही होता है।” कई सोशल मीडिया यूजर्स ने इस पर भी चर्चा की कि कैसे रिमोट और हाइब्रिड वर्क मॉडल के आने से हर समय उपलब्ध रहने की उम्मीदें और बढ़ गई हैं।

यह बहस तब और बढ़ गई जब अलग-अलग इंडस्ट्री के कर्मचारियों ने छुट्टी की अर्जी खारिज होने, वीकेंड पर काम करने और छुट्टियों या बीमारी में भी ऑनलाइन रहने के दबाव से जुड़े अपने निजी अनुभव शेयर किए। कई लोगों ने तर्क दिया कि कई कंपनियों में कर्मचारियों की भलाई से ज्यादा उनकी हर समय की उपलब्धता को प्राथमिकता दी जाती है।

वहीं, कुछ यूजर्स ने यह भी कहा कि काम का दबाव इंडस्ट्री और कंपनी के स्ट्रक्चर पर भी निर्भर करता है। जबकि कुछ ने छुट्टी की प्लानिंग और काम के मैनेजमेंट को लेकर कर्मचारियों और मैनेजमेंट के बीच बेहतर बातचीत की जरूरत पर जोर दिया।

मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स और HR प्रोफेशनल्स भी इस चर्चा में शामिल हुए। उन्होंने बताया कि ऑफिस का लगातार तनाव और काम से डिस्कनेक्ट न हो पाना लंबे समय में एंग्जायटी, थकान और प्रोडक्टिविटी में कमी का कारण बन सकता है। एक्सपर्ट्स अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि कर्मचारियों का पर्याप्त आराम करना और छुट्टियों का इस्तेमाल करना उनकी लंबी अवधि की परफॉर्मेंस और कंपनी की सेहत के लिए भी जरूरी है।

यह वायरल बातचीत काम को लेकर बदल रही सोच को भी दिखाती है, खासकर युवा पीढ़ी के बीच जो अब फ्लेक्सिबिलिटी, मेंटल हेल्थ और बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस को ज्यादा तवज्जो दे रही है। महामारी के बाद दुनिया भर में काम को लेकर उम्मीदें बदली हैं, जिसके चलते टॉक्सिक वर्क कल्चर, बर्नआउट और कर्मचारी अधिकारों पर चर्चा आम हो गई है।

जैसे-जैसे यह वीडियो ऑनलाइन फैलता जा रहा है, कई कर्मचारी कह रहे हैं कि इसने एक महत्वपूर्ण बातचीत शुरू की है कि क्या कंपनियां वास्तव में पेड लीव पॉलिसी का सम्मान करती हैं, या वे इसे सिर्फ एक अच्छे माहौल के बिना कर्मचारी-हितैषी लाभ के रूप में पेश करती हैं।

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