सिंगापुर में, प्रोबेशन के अंत में एक महिला को गलत तरीके से निकालने पर कंपनी को फटकार। खराब परफॉर्मेंस साबित करने में विफल रहने पर ट्रिब्यूनल ने कंपनी को लगभग 19 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।

सिंगापुर: कॉर्पोरेट जगत में कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करने वाला एक बड़ा फैसला सामने आया है। सिंगापुर की एम्प्लॉयमेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (ECT) ने एक कंपनी को छह महीने के प्रोबेशन पीरियड के आखिर में एक महिला अधिकारी को "अचानक और गलत तरीके से" नौकरी से निकालने पर फटकार लगाई है। कोर्ट ने कंपनी को आदेश दिया है कि वह पीड़ित महिला को कानून के तहत मिलने वाला अधिकतम मुआवजा, यानी करीब 19 लाख रुपये, दे।

हाल ही में जारी हुए इस फैसले में ट्रिब्यूनल ने कॉर्पोरेट कंपनियों को एक कड़ा संदेश दिया है। मजिस्ट्रेट ने साफ कहा कि कंपनी यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही कि महिला कर्मचारी ऑडिट मैनेजर पद के लिए जरूरी परफॉर्मेंस स्टैंडर्ड को पूरा नहीं कर रही थी।

छह महीने बाद ही नौकरी से निकाला

रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में पीड़ित महिला ने अप्रैल 2025 में एक कंपनी में ऑडिट मैनेजर के तौर पर काम शुरू किया था। कंपनी के नियमों के हिसाब से उनका छह महीने का प्रोबेशन पीरियड तय हुआ था। लेकिन जैसे ही यह पीरियड खत्म होने वाला था, कंपनी ने खराब परफॉर्मेंस का बहाना बनाकर उन्हें नौकरी से निकाल दिया।

कंपनी के इस एकतरफा फैसले के खिलाफ महिला ने एम्प्लॉयमेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (ECT) का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि काम के दौरान कंपनी ने उन्हें कभी कोई लिखित या मौखिक चेतावनी नहीं दी। उन्हें ऐसे परफॉर्मेंस स्टैंडर्ड पर जज किया गया, जिनके बारे में पहले कभी बताया ही नहीं गया था।

महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने कंपनी की एक इंटरनल ऑडिट रिपोर्ट में कुछ बदलावों पर आवाज उठाई थी, इसलिए उन्हें निशाना बनाया गया। उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी होने के बावजूद, उन्हें कोरियाई भाषा न आने के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ा। हालांकि, लंबी सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने भाषा के भेदभाव और व्हिसलब्लोअर वाले आरोपों को सबूतों की कमी के कारण खारिज कर दिया, लेकिन यह माना कि नौकरी से निकालने की प्रक्रिया पूरी तरह से गलत थी। फिलहाल, गोपनीयता नियमों के तहत फैसले में कर्मचारी और कंपनी, दोनों की पहचान छिपाई गई है।

खराब परफॉर्मेंस साबित नहीं कर पाई कंपनी

कोर्ट में कंपनी ने अपने गलत फैसले को सही ठहराने की बहुत कोशिश की। कंपनी ने दलील दी कि प्रोबेशन वाले कर्मचारियों को कुल परफॉर्मेंस में कम से कम 80% नंबर और 10 खास स्किल्स में से कम से कम 5 में 3 की औसत रेटिंग लानी होती है। कंपनी के मुताबिक, इस महिला ऑडिट मैनेजर को सिर्फ 71% नंबर और 2.4 की रेटिंग मिली थी।

लेकिन, ट्रिब्यूनल के मजिस्ट्रेट जोएल टैन ने कंपनी की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। मजिस्ट्रेट ने पाया कि मैनेजमेंट यह साबित नहीं कर पाया कि दिए गए नंबर कर्मचारी के असली काम को दिखाते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि महिला के सुपरवाइजर ने खुद कोर्ट में माना कि नौकरी की शुरुआत में इस तरह के किसी रेटिंग सिस्टम के बारे में कर्मचारी को नहीं बताया गया था और न ही कंपनी की पॉलिसी के मुताबिक कोई ऑफिशियल परफॉर्मेंस रिव्यू किया गया था।

इस वजह से कर्मचारी को यह पता ही नहीं था कि उसे कौन सा टारगेट पूरा करना है। मजिस्ट्रेट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि महिला को "असरदार तरीके से अंधेरे में रखा गया था।"

आरोपों के लिए कोई ठोस सबूत नहीं थे

कंपनी ने आरोप लगाया कि कर्मचारी ने डेडलाइन मिस की, निर्देशों का पालन नहीं किया और रिपोर्ट की फॉर्मेटिंग में भी गलतियां थीं। लेकिन सुपरवाइजर ने भी उनके ऑडिट के काम की क्वालिटी या तकनीकी क्षमता पर कोई सवाल नहीं उठाया था। कंपनी की ज्यादातर चिंताएं सिर्फ छोटे-मोटे प्रशासनिक मुद्दों को लेकर थीं। मजिस्ट्रेट ने माना कि कर्मचारी को कुछ छोटी-मोटी चीजों में सुधार की जरूरत हो सकती है, लेकिन ऐसे नियमों के आधार पर सीधे नौकरी से निकालना गैरकानूनी है जिनके बारे में ठीक से बताया ही न गया हो।

कानून की सीमा में मिला सबसे बड़ा मुआवजा

यह महिला हर महीने S$11,500 (सिंगापुर डॉलर) कमा रही थी। नियमों के मुताबिक, वह तीन महीने की सैलरी यानी S$34,500 की हकदार थीं। लेकिन एम्प्लॉयमेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (ECT) सिर्फ S$30,000 तक का ही मुआवजा दे सकता है। इसलिए, जज ने कानून के दायरे में उपलब्ध सबसे बड़ी रकम (करीब 19 लाख रुपये) महिला को देने का आदेश दिया। मजिस्ट्रेट टैन ने फैसले में यह भी कहा कि अगर मुआवजे की यह कानूनी सीमा नहीं होती, तो गलत तरीके से निकालने से हुई मानसिक परेशानी के लिए उन्हें दो महीने की सैलरी और जोड़कर कुल S$57,500 का मुआवजा दिया जाता। कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले के साथ एक कड़ा संदेश दिया: "कोई भी कंपनी अपने कर्मचारी से उन नियमों को पूरा करने की उम्मीद नहीं कर सकती, जिनके बारे में उसे ठीक से बताया ही नहीं गया हो।"