भारत का पहला थिएटर, जानिए 106 साल बाद क्यों तोड़ दिया गया था?

सार

World Theatre Day:  भारत का पहला थिएटर, एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस, 1907 में बना था। बाद में इसका नाम बदला गया और 2013 में इसे तोड़ दिया गया। जानिए पूरी कहानी!

India's First Ever Theatre History: दुनियाभर में वर्ल्ड थिएटर डे मनाया जा रहा है। 1961 में इस खास दिन की शुरुआत इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट (ITI) ने की थी और तब से लेकर अब तक यह 27 मार्च को हर साल मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत का पहला थिएटर कौन-सा था? आपको जान कर हैरानी होगी कि अगर इस थिएटर को तोड़ा ना गया होता तो आज यह अपना 118वां स्थापना दिवस मना रहा होता। जी हां, इस थिएटर की स्थापना 1907 में की गई थी और 2013 में म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने इसे तोड़ दिया था। जानिए भारत के पहले थिएटर के बारे में सबकुछ...

कौन-सा था भारत का पहला थिएटर?

भारत के पहले थिएटर का नाम था एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस, जिसकी स्थापना प्रसिद्ध उद्योगपति और टाटा ग्रुप के फाउंडर जमशेद जी प्रेम जी मदन ने की थी, जिन्हें दुनिया जमशेदजी टाटा के नाम से भी जानती हैं। 1907 में उन्होंने इस थिएटर की स्थापना की, लेकिन तब से लेकर इसे तोड़े जाने से पहले तक इसका नाम दो बार बदला गया। बताया जाता है कि एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस को थिएटर के जनक के नाम से मशहूर उत्तम कुमार प्रोजेक्टर की मदद से चलाया करते थे।

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एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस को और किन नामों से जाना गया?

कोलकाता स्थित एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस को 1919 में मदन थिएटर्स में मर्ज कर दिया गया, जो जमशेदजी टाटा द्वारा शुरू की गई भारत की पहली सिनेमा चैन थी। एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस ने बंगाली भाषा के कई सबसे लोकप्रिय साहित्य कृतियों को मंच प्रदान किया। 1920 और 1930 के दशक में इसे थिएटर की दुनिया में बड़ी ताकत माना जाता था। बाद में इस थिएटर का नाम मिनर्वा सिनेमा किया गया और फिर यह चैपलिन सिनेमा के नाम से मशहूर हो गया। बताया जाता है कि यह थिएटर हॉलीवुड फिल्मों की स्क्रीनिंग के लिए सबसे लोकप्रिय वैन्यू हुआ करता था। कथिततौर पर मुनाफ़ा बचाने की कोशिश में थिएटर के फाउंडर्स ने चार्ली चैपलिन के नाम पर इसे चैपलिन सिनेमा नाम दिया था।

क्यों तोडा गया था भारत का पहला थिएटर?

बताया जाता है कि चैपलिन सिनेमा में सालों तक किसी तरह की एक्टिविटीज नहीं हुईं और यह बंद रहा। इसके चलते घाटा उठाना पड़ रहा था। फाइनली 2013 में कोलकाता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने इसे तोड़ने का फैसला लिया।

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