
विभाजन पर बनी फिल्मों की कमी नहीं है, लेकिन 'मैं वापस आऊंगा' इस विषय को राजनीतिक बहस की बजाय मानवीय भावनाओं के नजरिए से देखने की कोशिश करती है। इम्तियाज़ अली के निर्देशन में बनी यह फिल्म यादों, बिछड़न, रिश्तों और अपने घर लौटने की चाह की कहानी कहती है। नसीरुद्दीन शाह, दिलजीत दोसांझ, शरवरी और वेदांग रैना जैसे कलाकारों से सजी यह फिल्म धीरे-धीरे दिल में उतरती है। यह कोई तेज रफ्तार ड्रामा नहीं, बल्कि एक भावनात्मक सफर है, जो दर्शकों को अतीत और वर्तमान के बीच ले जाकर कई सवालों से रूबरू कराता है।
फिल्म की कहानी 1947 के विभाजन की त्रासदी से शुरू होती है और वर्तमान समय तक पहुंचती है। ईशर सिंह ग्रेवाल (नसीरुद्दीन शाह) ने अपनी पूरी जिंदगी भारत में बिताई है, लेकिन उनका दिल आज भी उस घर में अटका है जो विभाजन के दौरान उनसे छूट गया था। उनके पोते निर्वैर (दिलजीत दोसांझ) को शुरुआत में यह सब एक बुजुर्ग की भावनात्मक जिद लगती है। लेकिन जैसे-जैसे वह दादा के अतीत को समझता है, कहानी यादों, दर्द, प्रेम और बिछड़न के कई परतों को खोलती जाती है।
नसीरुद्दीन शाह इस फिल्म की आत्मा हैं। उनका अभिनय इतना स्वाभाविक और असरदार है कि कई सीन्स में वह पूरी फिल्म पर हावी नजर आते हैं। उनकी आंखों में दिखता दर्द और अपने घर लौटने की तड़प सीधे दिल तक पहुंचती है। दिलजीत दोसांझ भी शानदार काम करते हैं। वह नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच एक मजबूत भावनात्मक पुल बनकर उभरते हैं। शरवरी फिल्म का सुखद सरप्राइज हैं। जिया/अफसाना के किरदार में उनकी एक्टिंग संवेदनशील और प्रभावशाली है। वेदांग रैना भी प्रभावित करते हैं और साबित करते हैं कि उनमें लंबी रेस का दम है। बनिता संधू, मनीष चौधरी, रजत कपूर, कुमुद मिश्रा, दानिश पंडोर और अंजना सुखानी समेत पूरी सपोर्टिंग कास्ट कहानी को मजबूती देती है।
इम्तियाज़ अली का निर्देशन इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। उन्होंने कहानी को जरूरत से ज्यादा भावुक या मेलोड्रामेटिक बनाने की कोशिश नहीं की। फिल्म की सादगी ही इसकी खूबसूरती बन जाती है। कई सीन ऐसे हैं जहां कम संवादों के बावजूद भावनाएं दर्शकों तक गहराई से पहुंचती हैं। डायरेक्टर ने यादों, बिछड़न और घर लौटने की चाह को बेहद परिपक्वता से पेश किया है।
फिल्म का संगीत कहानी का भावनात्मक विस्तार बनकर सामने आता है। गाने कहीं भी जबरदस्ती नहीं लगते, बल्कि कथा को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। बैकग्राउंड स्कोर कई सीन्स को और ज्यादा असरदार बनाता है। कुछ धुनें फिल्म खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक याद रहती हैं।
तकनीकी तौर पर फिल्म मजबूत नजर आती है। एडिटिंग दो अलग-अलग समयकालों को सहज तरीके से जोड़ती है और कहानी की गति को संतुलित बनाए रखती है। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की बड़ी यूएसपी है। कई फ्रेम पोस्टकार्ड जैसी खूबसूरती लिए हुए हैं। कैमरा वर्क भावनाओं को उभारने में सफल रहता है। प्रोडक्शन डिजाइन और विजुअल टोन भी कहानी के माहौल को विश्वसनीय बनाते हैं।
अगर आपको भावनात्मक और कंटेंट आधारित फिल्में पसंद हैं, अगर आप विभाजन की मानवीय कहानियों में दिलचस्पी रखते हैं, नसीरुद्दीन शाह और दिलजीत दोसांझ की दमदार परफॉर्मेंस के फैन हैं और इम्तियाज अली के डायरेक्शन के कायल हैं तो यह फिल्म आपके लिए ही है। तेज रफ्तार मसाला एंटरटेनर की उम्मीद और एक्शन और बड़े कमर्शियल मोमेंट्स की चाह लेकर यह फिल्म देखने ना जाएं। हमारी ओर से इस फिल्म को 5 में से 4 स्टार।
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