दिग्गज एक्टर नसीरुद्दीन शाह हाल ही में हैदराबाद एयरपोर्ट पर एक पत्रकार के सवालों पर भड़क गए। सवाल 'जश्न-ए-उर्दू कार्यक्रम' से जुड़े उनके उस आर्टिकल पर था, जिसमें उन्होंने चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं। पढ़िए नसीर ने अपने आर्टिकल में क्या आरोप लगाए हैं.…
जश्न-ए-उर्दू प्रोग्राम से आखिरी समय पर हटाए गए नसीरुद्दीन शाह
वेटरन एक्टर नसीरुद्दीन शाह ने मुंबई यूनिवर्सिटी की कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि उन्हें 1 फरवरी को होने वाले जश्न-ए-उर्दू कार्यक्रम में बुलाया गया था, लेकिन 31 जनवरी की देर रात उन्हें अचानक बताया गया कि अब उनकी मौजूदगी की ज़रूरत नहीं है। शाह के अनुसार, यह फैसला बिना किसी स्पष्ट वजह या माफी के लिया गया, जो उन्हें अपमानजनक लगा।
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नसीरुद्दीन शाह को किस बात से लगा सबसे बड़ा झटका?
नसीरुद्दीन शाह ने इंडियन एक्सप्रेस के लिए लिखे अपने एक आर्टिकल में दावा किया कि उन्हें असली झटका तब लगा जब कार्यक्रम में मौजूद लोगों को बताया गया कि उन्होंने खुद आने से इनकार कर दिया था। वे लिखते हैं, "यूनिवर्सिटी ने मुझे यह बताने के बाद कि मुझे आने की ज़रूरत नहीं है। ऊपर से नमक छिड़कने का काम किया और यह ऐलान कर दिया कि मैंने आने से इनकार कर दिया था।" शाह ने इस दावे को पूरी तरह खारिज किया।
नसीरुद्दीइन शाह का सवाल- मैंने कैसे देश को नीचा दिखाया?
75 साल के नसीरुद्दीइन शाह ने आर्टिकल में इशारा किया कि उन्हें कार्यक्रम से हटाने की असली वजह उनके राजनीतिक विचार हो सकते हैं। उन्होंने लिखा, "मुझ पर यह आरोप लगाया गया कि मैं खुलकर देश के खिलाफ बयान देता हूं। मैं पूछता हूं—मैंने ऐसा कौन सा बयान दिया है जिसमें मैंने भारत को नीचा दिखाया हो?" शाह ने आगे इशारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा और कहा, "हां, मैंने कभी खुद को 'विश्वगुरु' कहने वालों की तारीफ नहीं की।" उन्होंने यह बात मानी कि वे प्रधानमंत्री और मौजूदा सरकार की कार्यशैली पर आलोचनात्मक रुख अपनाते हैं।
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नसीरुद्दीन शाह ने देश के माहौल पर उठाया सवाल
अपने आर्टिकल में नसीरुद्दीन शाह ने देश के मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक माहौल पर चिंता जताई। उन्होंने लिखा, "यह वो देश नहीं है जिसमें मैं बड़ा हुआ और जिसे प्यार करना सीखा। यहां 'थॉट पुलिस' और 'डबलस्पीक' पूरी ताकत से काम कर रहे हैं और हर समय निगरानी हो रही है।"
नसीरुद्दीन शाह ने दिया जॉर्ज ऑरवेल के नॉवेल का उदाहरण
नसीरुद्दीन शाह ने अपने आर्टिकल में जॉर्ज ऑरवेल के फेमस उपन्यास '1984' का हवाला भी दिया। उन्होंने लिखा, "आज के माहौल में 'महान नेता' की तारीफ ना करना भी देशद्रोह माना जाता है।" उन्होंने देश के वर्तमान माहौल को '24 घंटे नफरत का दौर' बताया और कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी सिमटती जा रही है।
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