पटना (Bihar) । देश-दुनिया में बिहार की पहचान राज्य की प्रतिभाओं की वजह से भी हुई। बिहार की माटी ने कई गणितज्ञ दिए हैं। वशिष्ठ नारायण सिंह (Vashistha Narayan Singh) इन्हीं में सबसे खास हैं। गरीबी के बावजूद अपनी लगन और बुद्धि की वजह से उन्होंने मुकास उच्च शिक्षा प्राप्त की। कहते हैं कि 1969 में नासा का अपोलो मिशन लॉन्च हुआ था। तब पहली बार इंसान को चांद पर भेजा गया था। लेकिन मिशन के दौरान कुछ देर के लिए 31 कंप्यूटर बंद हो गए थे। उस वक्त वशिष्ठ नारायण ने गणित लगाकर हिसाब निकाला।
नासा में जब बंद कंप्यूटर चालू हुए तो वशिष्ठ और कंप्यूटर का कैलकुलेशन बिल्कुल सही था। पिछले साल 14 नवंबर 2019 को उनका निधन हो गया था। सोते-जागते मैथ और कैलकुलेशन ही वशिष्ठ नारायण की दुनिया थे। वो मैथ में इतना रम गए थे उनका दिमाग इसी में उलझ गया। वो करीब करीब 40 साल तक मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया से जूझते रहे।
(फाइल फोटो)
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वशिष्ठ नारायण का पूरा जीवन उतार-चढ़ाव भरा रहा है। एक वक्त में वह अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा में काम करते थे। उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब वो लगभग विक्षिप्त हो गए और कई साल तक गुमनामी में जिंदगी गुजरी।
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वशिष्ठ का जन्म बिहार के बसंतपुर गांव में 2 अप्रैल 1942 को हुआ था। वह पढ़ाई में इतने तेज थे कि उन्होंने पढ़ाई के आगे गरीबी को आड़े नहीं आने दिया था।(फाइल फोटो)
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पटना साइंस कॉलेज में पढ़ाई के दौरान गलत पढ़ाने पर गणित के अध्यापक को बीच में ही टोक दिया करते थे। घटना की सूचना मिलने पर जब कॉलेज के प्रधानाचार्य ने उन्हें अलग बुला कर परीक्षा ली, तो उन्होंने सारे सवालों के सही जवाब दिए। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन एल. केली ने सबसे पहले उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अमेरिका ले गए। वशिष्ठ की कहानी अमेरिका के महान गणितज्ञ जॉन नैश से मिलती जुलती है जिनके ऊपर हॉलीवुड में एक शानदार मूवी बनी है- अ ब्यूटीफुल माइंड। (फाइल फोटो)
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वशिष्ठ ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से 1969 में प्रोफेसर जॉन एल. केली के मार्गदर्शन में ही 'साइकल वेक्टर स्पेस थ्योरी' में पीएचडी पूरी की। इसके बाद वह वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए। उन्होंने अमेरिका के नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) में भी काम किया।
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वशिष्ठ की शादी 1973 में वंदना रानी सिंह के साथ हुई। वह अपनी पत्नी के साथ अमेरिका चले गए थे। बताते हैं कि पत्नी को उनकी हरकतें सही नहीं लगी। कुछ समय बाद उन्हें वशिष्ठ की मानसिक बीमारी के बारे में पता चला, जिसके बाद उन्होंने तलाक ले लिया।
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भारत लौटने पर साल 1971 में वशिष्ठ नारायण ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर में अध्यापन शुरू किया। महज आठ महीने बाद ही उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर), बंबई (अब मुंबई) काम करने पहुंच गए।
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1974 में वशिष्ठ नारायण को कोलकाता के भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई) में स्थायी प्रोफेसर नियुक्त किया गया। वर्ष 2014 में उन्हें बिहार में मधेपुरा के भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफेसर नियुक्त किया गया।
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एक बार वशिष्ठ नारायण अपने भाई के साथ रहने के लिए पुणे जा रहे थे। लेकिन, अचानक ट्रेन से गायब हो गए। उन्हें खूब तलाशा गया, मगर नहीं मिले। चार साल के बाद अपनी पूर्व पत्नी के गांव के पास मिले। तब से घरवाले इन नजर रख रहे थे और इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया। जिसके बाद वह चर्चा में आए।(फाइल फोटो)
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पटना के कुल्हड़यिा कॉम्पलेक्स में अपने भाई के एक फ्लैट में गुमनामी का जीवन बिताते रहे और 2019 में निधन हो गया। महान गणितज्ञ के अंतिम समय तक किताब, कॉपी और पेंसिल ही उनके सबसे करीब रहें। (फाइल फोटो)
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