Published : Sep 28, 2020, 06:23 PM ISTUpdated : Sep 28, 2020, 06:25 PM IST
पटना (Bihar) । बिहार में संघर्ष के बाद देश में नाम रोशन करने वालों की संख्या बहुत अधिक है। इनमें विशिष्ट स्थान किसान के बेटे संप्रदा सिंह (Samprada Singh), का है, जो शून्य से शिखर तक का सफर संघर्ष के बीच पूरा किए थे। बताते हैं कि वे कभी डॉक्टर बनना चाहते थे। लेकिन, ऐसा न होने पर मेडिकल स्टोर खोल लिए। इसके बाद मुश्किलों का सामना करते हुए कुछ ऐसा काम किए कि दुनिया भर के अमीर भी उन्हें देखकर हैरान हो गए। आइये आज "बिहार के लाल" सीरीज में जानते हैं इस कारोबारी बेटे की कहानी...।
जहांनाबाद जिले के ओकरी गांव के किसान परिवार में 1925 में जन्में संप्रदा सिंह डॉक्टर बनना चाहते थे। हालांकि ऐसा नहीं हो पाया। इसके बाद उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी से बीकॉम की पढ़ाई की।
(फाइल फोटो)
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साल 1953 में पटना में एक साधारण दवा दुकान से अपने संघर्ष की शुरुआत की। सात साल बाद ही 1960 में उन्होंने फार्मास्युटिकल्स डिस्ट्रिब्यूशन फर्म "मगध फार्मा" की नींव डाली और जल्द ही डिस्ट्रीब्यूटर बन गए।
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1973 में वो मुंबई चले गए। मुश्किल हालात और कारोबारी प्रतिद्वंद्विता के बीच उन्होंने अपनी कंपनी "एल्केम लेबोरेटरीज" (Alkem Laboratories) की नींव डाली। शुरू के सालों में बेहद मुश्किल संघर्ष करना पड़ा। लेकिन, 1989 में उनकी कंपनी ने "एंटी बायोटिक कंफोटेक्सिम का जेनेरिक वर्जन टैक्सिम" बना लिया।
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संप्रदा सिंह के डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और किफायती मूल्य की वजह से "टैक्सिम"ने बाजार में तहलका मचा दिया। आज की तारीख में संपदा की एल्केम लेबोरेटरीज, फार्मास्युटिकल्स और न्यूट्रास्युटिकल्स बनाती है और 30 से ज्यादा देशों में कंपनी का कारोबार है।
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2017 में फोर्ब्स इंडिया ने संप्रदा सिंह को देश के टॉप 100 भारतीय धनकुबेरों में 52वां स्थान दिया था। उस समय संप्रदा सिंह 3.3 अरब डॉलर के मालिक थे। वो फोर्ब्स में शामिल होने वाले बिहार के पहले कारोबारी थे।
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बताते हैं कि 2017 की इसी लिस्ट में दुनिया के जाने-माने कारोबारी मुकेश अंबानी के भाई अनिल अंबानी संप्रदा सिंह से पीछे थे। अनिल को लिस्ट में 45वां स्थान मिला था। लेकिन, जुलाई 2019 में उनका निधन हो गया था। वो काफी बुजुर्ग भी थे। उन्हें दुनियाभर के कई सम्मान भी मिल चुके हैं।
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