Published : Jan 04, 2021, 01:51 PM ISTUpdated : Jan 04, 2021, 01:52 PM IST
बिजनेस डेस्क। भारतीय यूजर्स के क्रेडिट-डेबिट कार्ड (Credit-Debit Card) का डेटा चोरी होने और उसे डार्क वेब (Dark Web) पर बेचे जाने की खबरें आई हैं। एक साइबर सिक्युरिटी (Cyber Security) रिसर्चर ने यह दावा किया है कि देश के करीब 10 करोड़ डेबिट-क्रेडिट कार्ड धारकों का डेटा डार्क वेब पर बेचा जा रहा है। ज्यादातर डेटा बेंगलुरु स्थित डिजिटल पेमेंट्स गेटवे जसपे (Juspay) के सर्वर से लीक हुआ है। बता दें कि दिसंबर 2020 में भी देश के 70 लाख से ज्यादा यूजर्स के क्रेडिट और डेबिट कार्ड का डेटा चोरी हुआ था।
(फाइल फोटो)
जानकारी के मुताबिक, चोरी किए गए डेटा में भारतीय क्रेडिट-डेबिट कार्ड होल्डर्स के नाम के साथ उनके मोबाइल नंबर, इनकम की डिटेल, ईमेल आईडी और पैन कार्ड नंबर शामिल हैं। ये सारी जानकारी डार्क वेब पर बेची जा रही है। (फाइल फोटो)
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इस डेटा चोरी के बारे में जसपे (Juspay) ने कहा है कि किसी साइबर अटैक के दौरान किसी भी कार्ड के नंबर या फाइनेंशियल डिटेल के साथ कोई समझौता नहीं किया गया है। कंपनी ने कहा है कि रिपोर्ट में 10 करोड़ यूजर्स के डेटा चोरी होने की बात कही जा रह है, लेकिन असलियत में यह संख्या कम है। (फाइल फोटो)
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जसपे (Juspay) के एक स्पोक्सपर्सन का कहना है कि 18 अगस्त 2020 को कंपनी के सर्वर तक हैकर्स की पहुंच होने की कोशिश का पता चला था, जिसे रोक दिया गया था। इससे किसी भी कार्ड के नंबर और दूसरे डिटेल का डेटा लीक नहीं हुआ। हालांकि प्रवक्ता ने माना कि कुछ डेटा, प्लेन टेक्स्ट ईमेल और फोन नंबर लीक हुए, लेकिन उनकी संख्या 10 करोड़ से बहुत कम है। (फाइल फोटो)
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दावा किया जा रहा है कि कंपनी का चुराया गया डेटा डार्क वेब पर क्रिप्टोकरंसी (Cryptocurrency) बिटकॉइन (Bitcoin) के जरिए बेचा जा रहा है। इस डेटा के लिए हैकर्स टेलीग्राम ऐप के जरिए भी संपर्क कर रहे हैं। (फाइल फोटो)
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जसपे (Juspay) यूजर्स का डेटा स्टोर करने में पेमेंट कार्ड इंडस्ट्री डेटा सिक्युरिटी स्टैंडर्ड (PCIDSS) का पालन करती है। अगर हैकर कार्ड फिंगरप्रिंट बनाने के लिए हैश अल्गोरिथम (Hash Algorithm) का इस्तेमाल करते हैं, तो वे मास्कस्ड कार्ड नंबर को डिक्रिप्ट कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में सभी 10 करोड़ कार्डधारकों के अकाउंट को खतरा पहुंच सकता है। (फाइल फोटो)
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जसपे (Juspay) ने इस बात को माना है कि हैकर्स की पहुंच कंपनी के एक डेवलपर तक हो गई थी, लेकिन जो डेटा लक हुए हैं, वे ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं। इसके बावजूद कंपनी ने डेटा लीक होने की जानकारी अपने मर्चेंट पार्टनर को दी है। (फाइल फोटो)
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इंटरनेट पर ऐसी कई वेबसाइट्स हैं, जो आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले गूगल, बिंग जैसे सर्च इंजन के दायरे में नहीं आतीं। इन्हें डार्क या डीप नेट कहा जाता है। इस तरह की वेबसाइट्स तक स्पेसिफिक ऑथराइजेशन प्रॉसेस, सॉफ्टवेयर और कन्फिगरेशन के जरिए पहुंचा जा सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 में देश में सभी तरह के साइबर क्राइम से निपटने के लिए वैधानिक उपाय मौजूद हैं। ऐसे अपराध सामने आने पर संबंधित एजेंसियां कानूनी कार्रवाई करती हैं। (फाइल फोटो)
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